साहित्य

स्त्री

पवन कुमार श्रीवास्तव

औरत अपना हिस्सा कहाँ जी पाती है
वह तो हिस्सों में ही जी पाती है
कभी किसी की बिटिया कहलाती है
कभी किसी की पत्नी बनकर
तो कभी बहू कहलाती है
कभी किसी की माँ बनकर
इसी तरह जिन्दगी भर
वह हिस्सों में जी पाती है
उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं
इन्हीं सांसारिक रिश्तों में सिमट जाती है
स्त्री केवल स्त्री ही रहकर
हर रूप में अपना किरदार निभाती है
पितृ समाज मैं वह अपना स्थान नहीं पाती है
वह टुकड़ों में ही रहकर जी पाती है
उसे उसका हक मिलना चाहिए
कितना दर्द वह सहन करती है
बच्चों को जन्म देकर भी
संतान पिता की कहलाती है
सीता तो कभी दुर्गा का नाम देकर
महिमा मण्डित की जाती है
स्त्री स्त्री ही कहलाती है
रिश्तों की दुहाई देकर
स्त्री ही प्रताड़ित की जाती है
इसका समाधान होना जरूरी है
स्त्री खुद ही स्त्री की एक कमजोरी है

 

पवन कुमार श्रीवास्तव

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!