साहित्य

ऐ धरा मातृभूमि मेरी

प्रिया काम्बोज प्रिया

कितना दर्द ऐ धरा ,छुपा के रखतीं हैं तू
कितनी पीड़ा सहती है संसार के लिए तू
न कभी सोचा हमनें के कितना दर्द सहती हैं तू
कभी खोदा,कभी उजाड़ा,कभी उदरभी चीरा है तेरा
कभी रसायन,कभी प्रदूषण न जाने कितना दुर्व्यवहार पाती है तू
वन उपवन, पशुपक्षी पहाड़,नदी सब श्रृंगार है तेरा
नया रूप धरने को प्रकृति रुप बिगाड़ा है तेरा
बस अपने सर्वार्थ मे सब विनाश करने मे लगा है इंसान तू
जब बर्दास्त न होता तुझसे अपना रौद्र रूप दिखाती है तू
चीख चीखकर हर बार सबक नया सिखा जाती है तू
ऐ वसुंधरे, मातृभूमि मेरी कितना दर्द छुपा के रखतीं है तू
तेरे दर्द की पीड़ा अपार न जाने कैसे सहती है तू
जब छोटे थे तो करते तेरी प्रकृति सौंदर्य से प्यार
न जाने बड़ा होकर क्यू सर्वार्थ में जुट गए इंसान तू
रोक ले , संभल जा न खेल इस धरा से ए इंसान तू
ए इंसान ,कहीं गुम न हो जाएअस्त्वि तेरा और तू
रूह कांप जाती है मेरी कैसे लिख कर बयां करूं
दर्द ए हाल तेरा ……. अब मुझे बता दें एक बार तू
गर मेरे लिखने से…..दर्द हो जाए कम तेरा
एक बार नहीं तो बारम्बार लिखते हैं दर्द ए हाल बयां
कर तू
प्रिया काम्बोज प्रिया ✍️ सहारनपुर उत्तर प्रदेश स्वरचित कविता

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