
मैं हिंदी में अगर सबसे ज्यादा किसी साहित्यकार को पसंद किया तो वे मुंशी प्रेमचंद जी हैं। उनकी कहानियों को पढ़ने में जो भाव बनते वह गंभीर भाव बनते और मन की गहराइयों को छू जाते। एक आम आदमी के हालातों को उठाते और एक ऐसा खाका खींचते, एकदम जीवंत कहानी बन जाती।
उनकी कहानियाँ, उपन्यासों को पढ़ने में अलग आनन्द आता। शब्दों में ऐसा जान डाल देते थे कि बार-बार पढ़ने को मन करता। मैंने उनकी कहानी काकी कम से कम सैकड़ों बार पढा हूँ। सच में जो सच था वही चीज पन्नों में प्रेमचंद जी ने उतारा। ऐसा चित्रण करते थे। मन का कोना- कोना छू जाता। मंत्र, नमक का दारोगा, अलगू चौधरी तथा जुम्मन की दोस्ती की कहानी पंच परमेश्वर अंतरात्मा को हिलाकर रख देती थी।
ईदगाह कहानी भी कई बार पढा। इनकी कोई कहानी एक बार पढकर नहीं छोड़ा बल्कि बार-बार मैं पढता था। छात्र जीवन था। भरपूर समय होता था। यहाँ तक कि पाठ्यक्रम की किताब पढते-पढते जब उबने लगते तो मुंशी प्रेमचंद जी का उपन्यास या कहानियाँ की किताब खुल जाती। एक-एक पंक्ति आराम से पढता और उसमें एक ऐसा आनन्द मिलता जैसे गरमागरम चाय आराम से चुस्कियों के साथ पिया जा रहा है।
उनके उपन्यास गबन, गोदान, उर्मिला को खूब पढा। एक बार में मैं अघाता नहीं था। जैसे भूख सी लगी रहती थी। और खा लें अर्थात और पढ़ लें। कभी-कभी तो कोई पंक्ति छ: सात बार पढता और उसके भावों को समझ कर सोंचता था कि आखिर जब इतने महान-महान शब्द हैं तो लिखने वाला कितनी महान आत्मा वाला होगा।
मैं सबसे पहले अगर किसी लेखक पर आलेख लिखा तो उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी थे। इन पर लिखा आलेख चीन से निकल रही एक पत्रिका के उप संपादक के कहने पर लिखा था जो मेरा आलेख उस पत्रिका में छपा। मुझे जहाँ तक याद है वह सन 2016 के आसपास का समय था। हिंदीकुंज वेबसाइट पर भी प्रकाशित हुआ था।
प्रेमचंद जी के लेखन ने मुझे बहुत प्रेरित किया लिखने के लिए। एक सोंच विकसित की। आम आदमी की बातों पर लेखन की ओर मैं अग्रसरित हुआ। मेरे अंदर भी वही आम आदमी का दर्द होता है। आम आदमी की पीड़ा तथा अंदरूनी छटपटाहट को अपनी रचनाओं में विशेष स्थान देता हूँ। मुंशी जी के लेखन का प्रभाव मेरे लेखन में है और उसको मैं सदैव आत्मसात करता हूँ।
हर आदमी को प्रेमचंद जी को पढना चाहिए और एक संवेदनशील प्राणी बनना चाहिए। समाज में जो समस्यायें तथा दिक्कत है उसको अपना समझकर जरूरत मंद लोगों की मदद के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। हम प्रेमचंद जी को अगर भूलना चाहे तो यह नामुमकिन है।
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज




