साहित्य

फागुन फिर आकर चला गया

डॉ अर्जुन गुप्ता 'गुंजन'

प्रियतम के प्रेमिल प्राँगण में,
निशि वासर मन को छला गया।
बहुविधि वसंत के आँगन में,
फागुन फिर आकर चला गया॥

तंद्रिल तुषार के जाते ही,
ऋतुराज रंग लेकर आया।
पीली सरसों की क्यारी में,
मन का मयूर नित इतराया॥
इस रंग भरी फगुनाहट में,
मौसम महका कर चला गया।
बहुविधि वसंत के आँगन में,
फागुन फिर आकर चला गया॥

कोमल कलियाँ कुंजित गलियाँ,
मधुवन मनमोहक मनभाया।
नित राग रागिनी गा-गा कर,
चातक चकोर मन बहलाया॥
संदल समीर सकुचाया-सा,
नैनन आँसू छलछला गया।
बहुविधि वसंत के आँगन में,
फागुन फिर आकर चला गया॥

शुष्क हृदय बोझिल पलकें अरु,
मन का आँगन नित सूना है।
शोर मचाया सन्नाटे ने,
दर्द दिलों का अब दूना है॥
विकिरण रवि का अब नित्य दिवस,
मन के अंतस को जला गया।
बहुविधि वसंत के आँगन में,
फागुन फिर आकर चला गया॥

कलियाँ चटकीं भौंरे डोले,
फूलों का भाग्य पुन: जागा।
मधुपान मधुप करते हैं नित,
मंडप मुँडेर बोले कागा॥
मन की बगिया नित सूनी है,
जब से प्रियतम दिल जला गया।
बहुविधि वसंत के आँगन में,
फागुन फिर आकर चला गया॥

संवेदन सब शुष्क हुए हैं,
मन का कोना नित मुरझाया।
तिमिरांचल की चंचलता में,
जीवन को निशिदिन सुलझाया॥
यादों के गलियारे से अब,
मधुमास मधुर मनचला गया।
बहुविधि वसंत के आँगन में,
फागुन फिर आकर चला गया॥

© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!