साहित्य

गज़ल

संगीता श्रीवास्तव

चला जिस ओर तू क्या सोचता है बस बहारें हैं।
जो अपना छोड़ दर जाते वही टूटे सितारे हैं।

पराई जिस ज़मी पर यूँ पसीना बह रहा तेरा,
जो इस मिट्टी में मिलती भर गई होती कछारे हैं।

जो फुट पाथों के सीने में छुपा मुँह रोये रातों को,
वो पत्थर भींगकर सीने में उतरे मेरे सारे हैं।

फ़क़त इक बूँद बादल को तेरी आँखे तरसती हैं,
यहाँ बादल झरे इतने कि घर आँगन बुहारे हैं।

वहाँ पर काम से बोझिल तेरा तन हो रहा दोहरा,
यहाँ ढ़लती उमर काँधे पे ले हम दिन गुजारे हैं।

जो टीले पर छुपा रख दी तूने ओढनी उसकी,
कभी उठ-उठ के रातों को तुम्हें पगली पुकारे है.

यहाँ खेतोँ व खलिहानों में तेरा बोलबाला था.
वहाँ भाड़े के कमरे में सिमट क्या दिन गुजारे हैं।

संगीता श्रीवास्तव

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