
बैसाखी की उमंग
सोने जैसी चमक रही है, खेतों में अब धान,
मेहनत का फल देख रहा है, खुश होकर किसान।
हवा चली जब म स्तानी तो, झूम उठी है रीत,
खेतों में तैयार फसल, गाए नूतन गीत।
ढोल नगाड़े बजने लागे, गूँज उठा आकाश,
चेहरों पर मुस्कान खिली है, मन में नया प्रकाश।
गले मिले सब भूल के शिकवे, हार हुई या जीत,
बैसाखी में भांगड़ा, बढ़ा रहा है प्रीत।
पगड़ी बाँध के गबरू आए, पहन के कुड़ता लाल,
गिद्दा पावन कुड़ियाँ आईं, चल के अपनी चाल।
खुशियों का यह मेला देखो, सुहानी सी है मीत,
धरती अंबर साथ मनाएँ, खुशहाली की रीत।
डॉ. अनीता निधि , जमशेदपुर, झारखंड




