साहित्य

चापलूसी… हास्य व्यंग्य

जयचन्द प्रजापति 'जय'

मैं एक ही जगह काठ के घोड़े की तरह टिप टाप करता रहा पर कोई तरक्की नहीं हुई। किसी ने तरक्की के लिए चापलूस बनने की सलाह दी।

चापलूसी करने से बड़ा से बड़ा पद हथियाया जा सकता है। चापलूसी करने में हमें तरक्की के सुअवसर दिखते नजर आये। मैंने भी शपथ ली कि दुनिया का सबसे बड़ा चापलूस बनूंगा।

पहुंचते ही अपने आला अधिकारी को सलाम ठोंका। हल्की स्माइल की। साहब हम पर फिदा हो गये। साहब मेरे अंदर का सबसे बड़ा चापलूस देखा। मैं अब हां में हां मिलाने लगा। साहब हर बात मेरी मानने लगे।

अब मेरी चापलूसी नये शिखर पर पहुंच गयी। उपरी आमदनी भी होने लगी। रोज नये-नये ग्राहक मिलने लगे। इस कदर मेरी चापलूसी तरक्की की ओर जाने लगी भाईसाहब। आमदनी से ज्यादा चापलूसी से आय होने लगी।

रातों रात मैं मालामाल हो गया। नौकर चाकर गाड़ी घोड़ा सब आ गये। बैंक बैलेंस कई गुना हो गया। मेरी चापलूसी आगे की ओर जाने लगी। तरक्की के रास्ते खुलते गये। इस प्रकार चापलूसी की हथकंडा अपना कर बड़ा तोंद कर लिया।

चापलूसी करना गलत है। अवैध वसूली है। अहिंसक ढंग से लूटपाट करना होता है। सुधरने की बहुत कोशिश की लेकिन लत लग थी चापलूसी की छुटी नहीं। चापलूसी से पदोन्नति हो गयी। उपरी आमदनी की कई गुना वृद्धि हो गयी। चापलूसी स्वयं को लाभ दे सकता है लेकिन दूसरे के लिये हानिकारक औषधि की तरह है।

…… जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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