
अक्षय तृतीया का… तेजस्वी प्रभात।
धरा दहक उठी… गगन हुआ प्रखर प्रकाशमय।
वज्र-सी वाणी में आकाश पुकार उठा—
“कौन है यह… ज्वालामय अवतार?”
पवन भी थर्राया—
“यह भृगुवंश का… गर्व अपार!”
जमदग्नि-सुत… रेणुका नंदन।
धर्म का साक्षात प्राण।
नेत्रों में अग्नि…
भुजाओं में वज्र…
वाणी में अडिग विधान।
परशु गर्जित हुआ—
“मैं क्रोध नहीं… … धर्म का संकल्प हूँ!”
“अधर्म के अंधकार को चीरता—
प्रज्वलित… दीप अनल्प हूँ!
“जहाँ अन्याय सिर उठाए—
वहाँ मैं… प्रलय बन छा जाता हूँ!”
“सत्य की रक्षा में…
स्वयं काल को भी… ललकार जाता हूँ!”
शिव-शक्ति से सिंचित यह तन।
तप से तप्त तपस्वी प्राण।
वेद-वाणी का जीवंत स्वर—
वचन बना अटल प्रमाण।
“क्षत्रिय धर्म… मेरा कर्तव्य!”
“अन्याय विनाश… मेरा व्रत!”
“भृगुवंशी हूँ मैं—
वचन निभाना ही… मेरा सत्य!”
भीतर करुणा का सागर…
बाहर वज्र-सा प्रहार।
भक्तों का भय हरने वाला…
दुष्टों का संहार।
अक्षय तिथि आज भी पुकारे—
“उठो…”
“धर्म को धारण करो!”
“अधर्म के हर अंधकार को—
अपने तेज से… भस्म करो!”
जय परशुराम—
अनंत!
अजेय!
अखंड!
अपार!
~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”
युवा लेखक, कवि एवं साहित्यकार
सक्ती, छत्तीसगढ़




