साहित्य

ग़ज़ल

डॉ गीता पांडेय "अपराजिता"

मिल रही हर घड़ी ताज़गी आपसे।
हो गई बामज़ा जिंदगी आपसे।।

जगमगाने लगी हैं मेरी जिंदगी
मिल गईं मुझको वो रोशनी आपसे।

जिंदगी में मुझे आप क्या मिल गए,
मिल गईं मुझको हर इक ख़ुशी आपसे।

दर बदर हम भटकते रहे मुद्दतों,
दिल में ख्वाहिश हमेशा रही आपसे।

दीद उम्मीद में लाज़मी है वफा,
कर रही हूंँ गुज़ारिश यही आपसे।

जो डगर थी कठिन वो भी आसाँ हुई,
हो गई जिस घड़ी दोस्ती आपसे।

आपने फेर ली हैं निगाहें तो क्या,
प्यार गीता को है आज भी आपसे।

डॉ गीता पांडेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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