साहित्य

भृगु परशुराम

बसंत श्रीवास "वसंत"

कहीं शास्त्र की गरिमा है, तो कहीं शस्त्रों की ज्वाला है,
वही संहारक है शिव का अंश, तो अमृत का भी प्याला है।
अधर पर मंत्र हैं जिनके भुजा में, वहीं परशु राम होगा ,
बस वहीं है जमदग्नि-नंदन, वही तो जग का उजाला है।।

हुई पीड़ित जब धरती माता।
क्षत्रिय वंस के अत्याचारों से।।
श्री हरि ने छठवीं जन्म लिया।
हरने भूभार पापी व्यवहारों से।।

जमदग्नि रेणुका का पुत्र भृगुवंशी।
फरसा धारक परसुराम कहलाये।।
अंशावतार शस्त्र शास्त्रों के ज्ञाता।
बैशाख सुदी तृतीया त्रेता के जाए।।

थे राम अभेद चट्टान रिपु संघारक।
शिवशिष्य शिव से फरसा पाया था।।
अद्वितीय योद्धा थे इस धरती के ।
और राम से परसुराम कहलाया था।।

देख पिता का अपमान हैहय से।
सहस्त्रार्जुन था जिसका सरदार।।
कार्तवीर्य सा क्षत्रिय शर काटकर।
रक्त रंजित पंचझील किया तैयार ।।

शिष्य जिनके भीष्म द्रोण कर्ण ने।
अचूक शस्त्रों का लिया पूर्ण ज्ञान।।
कल्पकाल तक चिरंजीवी रहने को।
श्री हरि, विष्णु ने है दिया वरदान ।।

*अक्षय तृतीया की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं*

बसंत श्रीवास “वसंत”(नरगोड़ा)
रामकृष्ण मिशन आश्रम नारायणपुर
छत्तीसगढ़

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