
सुख-दुख के पाटों के भीतर,
जीवन के मझधारे हैं।
विचलित होते नहीं कभी हम,
सुख-दुख हमको प्यारे हैं॥
सुख-दुख के धागों से निर्मित,
मानव जीवन की चादर।
ऊँच-नीच का भेद नहीं है,
करते हम सबका आदर॥
सदा समन्वित भाव लिए हम,
सबसे भाईचारे हैं।
विचलित होते नहीं कभी हम,
सुख-दुख हमको प्यारे हैं॥
कदम बढ़ा कर नभ को छू लें,
यह अधिकार हमारा है।
मानवता हम सदा निभाते,
यह संस्कार सहारा है॥
उज्ज्वल निर्मल चरित हमारा,
जैसे चाँद सितारे हैं।
विचलित होते नहीं कभी हम,
सुख-दुख हमको प्यारे हैं।।
सुख-दुख के दो तट के अंदर,
जीवन निर्झर बहता है।
मस्ती में रहते हम निशदिन,
विकसित जीवन कहता है।।
नहीं किसी को दुख पहुँचाते,
सब के वारे न्यारे हैं।
विचलित होते नहीं कभी हम,
सुख-दुख हमको प्यारे हैं।।
© डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




