साहित्य

पुनर्विचार

सुमन बिष्ट

रात गई बात गई,बीती सब बात गयी
पर कुछ बातें जज्बातों में उलझकर टूट गई
फिर दरकिनार करते करते बातों ही बातों में
कुछ बातें न जाने कैसे बिगड़ गई॥१

बीती बातों पर पुनर्विचार जब होता है
तब हर कोई अपना दुखड़ा रोता है
काश़ तब हम उस मौक़े पर यह कह पाते
बस यही दुख हर जुबां पर होता है ॥२

कोई अपने आपको पीड़ित बतलाता है
तो कोई चाहकर भी दिल का ग़ुबार निकाल नहीं पाता है
चाहता तो हर कोई है दिल की बात करना
पर अच्छा बनने की ख़ातिर चुप रह जाता है॥३

अतीत में झांकने से कुछ नहीं होगा
अगर कुछ सीख सके तो वो सबक़ होगा
नई सीख से ज़िंदगी का एक नया दृष्टिकोण दिखेगा
पीछे मुड़कर देखने से तो समय ही जाया(बर्बाद) होगा॥४

पुनर्विचार कर अतीत के सुख दुख का हिसाब क्या रखना
ज़िंदगी एक मिली है तो नज़रअंदाज़ी का मस्त मिज़ाज रखना
सब कर्मों का हिसाब यहीं पर होता है
बस सब अपना अपना खाता साफ़ रखना॥५

स्वरचित मौलिक रचना
सुमन बिष्ट

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