
घर-आँगन,चौबारे बगिया,
ढूँढ रही आज छाँव गौरैया।
दानापानी का सकोरा देखे,
पंख पसारे नीचे को आए।
दाना चुगती, पानी पीकर,
चीं चीं कर के शोर मचाए,
खुशी में ऐसे नर्तन करती,
ज्यों पूरी दुनिया पा जाए।
चुग कर दाना वन में उड़ती
उड़ उड़ बीजारोपण करती,
वर्षा पा हुए बीज अंकुरित,
यूँ वृक्षारोपण करे गौरैया।।
प्रकृति – संतुलन आधार है,
नन्हा जीव इस संसार का,
नहीं समझना चाहे मनुष्य,
करता नहीं उत्कृष्ट प्रयास।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।


