
मात्र नहीं ये पौधें होते,ये जीवन कहलाते।
बरखा-बादल,हवा-धरा सब,गीत इसी से गाते।।
मत काटो तुम वृक्ष धरा से,दुख कितनों को होता।
पशु-पक्षी सँग जंगल का भी,जीवन इसमें खोता।।
गेह नहीं जिसका धरती पर,ठोकर कितनी खाते।
बरखा -बादल,हवा धरा सब,गीत इसी से गाते।।
कोयल कूके मतवाली तब,मौसम प्यारा होता।
मौसम भी तो पौधों से है,पौधा इत्र सँजोता।।
जीवन की ही खोज करे है,प्राणी आते जाते।
बरखा -बादल हवा धरा सब गीत इसी से गाते।।
गर देना है जीवन दे दो, शुद्ध करो जल-थल को।
शुभद हाथ से पौधे देकर, सुंदर करना कल को।।
नष्ट न करना तरुवर प्यारा,शरण इन्हीं के सब आते।
बरखा -बादल हवा धरा सब, गीत इसी से गाते।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.




