साहित्य

इयरवा जहरवा खइले बा

विद्या शंकर विद्यार्थी

बड़ी तबाही के बात एह गर्मी में चल रहल बा।आ तबाही के बात ई बा कि लोग अपना उमगल मन के उमर के हिसाब से काबू में नइखे कर पावत आ नइखी कर पावत, आ छिपा चोरी में दिल दे बइठत बाड़न बाड़ी। दिल त दिल ह, सेही बीच लोक लाज में वैवाहिक संबंध कहीं आउर से बन जाता, आ बन्हा जात बिया जिंदगी संबंध के डोर में। आ ओने मजनुआ पर बिरह के बज्रपात होता, से ही में ऊ जहर खा जाता, मोबाइल के जुग बा,पतो लागत देरी नइखे लागत, कि मजनुआ मरे के नौबत में अपना के डाल झोंक लिहले बा, अब तरेराइल आंखों के सोझा त कम से कम दीदार दे दिहीं। सासाराम,गया, आरा बक्सर, बनारस आ अउरी जगह से मिले के सुरनधाइल बा, ई सुर आपन लोकप्रियता बटोरे के सुर बा। संइया फिर सुखाइल आम ना नू होइहें, मजनुआ खो जहरवा, नइहरवो आ अपना गंउओ के नाम रोसन कर। एगो मजनुआ रहे एह धरती पर।जवन गम बिटोर के गम में डूब गइल। छूंछे सकदम में डाल लेलस अपना के। सांंच श्रद्धांजलि के दिही रे इयरवा। हमरा समझ से मजनुआ के ‘उसने कहा था’
कहानी के लहना सिंह के रूप में आ जाए से जादे मर्यादा के बात होइत।
विद्या शंकर विद्यार्थी रामगढ़, झारखंड
रचना मौलिक स्वरचित

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