
आओ धरा का,अभिनन्दन करे हम।
भू का हरित रंग से ,चंदन करे हम ।
वृक्षों की धानी सुहानी चुनर से,
कर अलंकृत धरा को,नन्दन करे हम।
बचाना है प्रकृति, धरा-सम्पदा को,
तो कलुषित विचारों का,मर्दन करे हम।
पृथ्वी संरक्षण है,कर्तव्य हमारा,
न इसके नियम का,उल्लंघन करे हम।
बचाना है अपनी,हमे पीढ़ियों को,
गलत आदतों में,परिवर्तन करे हम।
यदि दोष अपना नही,है तो किसका?
शपथ ले,हृदय को निरंजन करे हम।
धरा की तपन ये,बढ़ी जा रही जो,
तो मिलकर पुनः इस पर,चिन्तन करें हम।
क्यूँ सोई हुई हैं,भावनाएं हमारी,
जगाये इन्हें,कुछ स्पंदन करे हम।
देंगे जो प्रकृति को,वही पाएंगे हम,
यही सच है,इसका ही,मंथन करे हम।
सकल गुणों की है,भण्डार प्रकृति,
चलो दिल में भर प्रेम,वंदन करें हम।
दी सांसे हैं हमको,ये जीवन दिया है,
प्रीत से माँ को अपनी,आलिंगन करे हम।
ये धरा ही है माँ तो,नेह से इसके ’पूजा’,
हृदय के सुप्त भावों का,सिंचन करें हम।
✍🏻अनुजा दुबे’पूजा’
स्वरचित/पूर्णतः मौलिक/अप्रकाशित©®



