
किसे हम मुँह दिखायेंगे कहाँ अब घर बसायेंगे।
प्रदूषण हम बढ़ाते ग़र रहे तो जी न पायेंगे।।
हुई मैली चुनर अपनी धरा की बाज़ आओ अब।
दिया ना ध्यान इस पर तो जहां बर्बाद पायेंगे।।
चलाओ तुम न यूँ खंजर न काटो पेड़ के गहने।
बचेंगे ही नहीं जंगल तो जीवन क्या बचायेंगे।।
बसाकर बस्तियाँ पर्यावरण खिलवाड़ अब रोको।
नदी-नाले हुए दूषित तृषा कैसे मिटायेंगे।।
सुहाना गीत चिड़ियों का अग़र आबाद ना होगा।
कहानी क्या मधुर फिर पीढ़ियों को हम सुनायेंगे।।
नहीं अब भी जगे तो नष्ट सभ्यता ही कर लेंगे।
दिये जो दुख सदा माँ को कभी माफी न पायेंगे।।
सुनों चित्कार धरती की बहुत व्याकुल हुई है ‘सुख’।
सुनेंगे जो नहीं मौसम यही हमको रुलायेंगे।।
सुखमिला अग्रवाल’भूमिजा’
©® स्वरचित मौलिक
मुंबई




