साहित्य

पृथ्वी संरक्षण

विरेन्द्र जैन "माहिर"

धरती है जीवन की आधार, इसे न यूँ उजाड़ो तुम,
हरियाली की शीतल छाया, अपने घर में बिखराओ तुम।
एक-एक पौधा रोपकर, ऋण इसका कुछ चुकाओ तुम,
माँ है ये सबकी पालनहार, इसे सदा सजाओ तुम।

नदियों का जल निर्मल रखो, स्वच्छता का दीप जलाओ,
नीला गगन, हरीतिमा संग, खुशियों का संसार बसाओ।
स्वार्थ त्याग कर आगे बढ़ो, प्रकृति से प्रेम निभाओ,
पृथ्वी दिवस का यही संदेश, हर दिल तक पहुँचाओ।

माटी की खुशबू में बसती, जीवन की हर एक कहानी,
इसकी गोद में पलती है, हर जन-मन की हरियाली।
आओ मिलकर कसम ये लें, रक्षा इसकी करेंगे हम,
धरती माँ के आंचल में, फिर भर देंगे खुशहाली।

वृक्ष लगाओ, जल बचाओ, यही सच्चा उपकार है,
प्रकृति के हर कण में छिपा, जीवन का विस्तार है।
स्वार्थ छोड़ कर आगे बढ़ो, यही समय की पुकार है,
धरती को संवारो मिलकर, यही हमारा धर्म सार है।

नन्हे-नन्हे कदमों से ही, बदलाव बड़ा आ जाता,
प्रेम भरा व्यवहार हमारा, जग को सुंदर बनाता।
पृथ्वी दिवस का संदेश, हर दिल में दीप जलाता,
सजती रहे ये धरा सदा, यही संकल्प दिलाता।

विरेन्द्र जैन “माहिर”
वड़ोदरा गुजरात

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