
धरा पर पेड़ पौधे से चलो रिश्ते सॅंवरते हैं।
कहीं पौधे इमारत के कहीं औषधि धरते हैं।।
बसा हो घर किसी का भी उजारो मत उसे बंदे।
दिलों में प्यार का उपवन लगाकर निखरते हैं।।
जमीं पर तेज तपती रेत तत्पर है जलाने को।
कृपा उनकी हमें मिलती अगर फरियाद करते हैं।।
भले हालत हो कुछ भी रखा जिंदा मानवता को।
मगर इतनी गुजारिश है हृदय से आस भरते हैं।।
बहुत लिखते रहे हो तुम मिलन तो प्रेम की ममता।
गरजता झूमता सावन सुनहरी याद भरते हैं।।
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ममता झा मेधा
डाल्टेनगंज




