
माँ पृथ्वी! तुम कितनी महान!
उपकारों का नहीं कोई प्रतिदान!
आश्रय देती जीव-अजीव सभी को
स्नेह से सींचती वनस्पतियों को
तत्त्वों का चक्र निरंतर चलायमान!
काया का बोझ रखते तुमपर
अट्टालिकाओं का बोझ भी तुम पर
कोई चलाता फावड़ा, कहीं खोदे खदान!
चोटें सहती पर कुछ न कहती
क्षमामयी! तुम क्षमा कर देती
तुमसे मांगें क्षमाशीलता का वरदान!
कोई संवारे, कभी रूप निखारे
किंचित कृतज्ञ हो पूजन भी करे
प्रहार और पूजा अपनाती एक समान!
युग-युग से प्रदक्षिणा करे सूरज की
युग-युग से सराहना करें धीरज की
शीश नवाकर करते नित-नित प्रणाम!
मीना जैन इंदिरापुरम गाजियाबाद।




