
विकास की अंधी दौड़ में
वृक्षों को बेरहमी से काटा है हमने
स्वार्थ की इस अंधी चाह में
प्रकृति को ही बाँटा है हमने।
आओ! इस पृथ्वी दिवस पर
हम संकल्प नया दोहराएँ,
वृक्षारोपण कर मिल-जुलकर
वनों को फिर से बसाएँ।
घरों के प्रांगण से लुप्त हुए जो
फलदार वृक्षों के साए,
कुछ आम, अमरूद, जामुन के
पेड़ हम फिर से लगाएँ।
कोयल, मैना, गौरैया
दिखते नहीं अब आस-पास
प्यारी प्यारी पक्षियों को
फिर से हम वापस बुलाएं॥
विलुप्त होते प्राणियों को
ढूंढती है आखें अब
क्यों न इनके लिए
एक बसेरा हम भी बनाएँ ॥
आने वाली पीढ़ी को हम
हरा-भरा संसार दें,
प्रकृति से प्रेम का सुंदर
एक अनमोल उपहार दें।
धरती माँ की गोद सजे फिर,
हरियाली का श्रृंगार हो,
विश्व पृथ्वी दिवस का यह पर्व
हम सबके जीवन का आधार हो।
✍️ईभा प्रसाद ( स्वरचित, अप्रकाशित)
इंदिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद



