हो मुलाक़ात इक बहाने से,
उनकी नजरे मिले मिलाने से।
लाख कोशिश करें ,छिपाने की,
मर्ज़ छिपता नहीं छिपाने से।
प्यार की प्यास बढ गई इतनी,
आग बुझती नहीं बुझाने से।
बाद मुद्दत के गुल खिला देखो,
बागबां खुश बहार आने से।
रूठ जाना भला लगे कैसे,
हमने सीखा यही जमाने से।
लोग खुशहाल दिख रहे कितने,
फूल खिलते बहार आने से।
*नागेंद्र नाथ गुप्ता, ठाणे (मुंबई)*




