
सब जन भारत महिमा गाएं, नव आभा से जागृत रहिए।
कुसमित पल्लव शोभित प्यारा, मन्द पवन का झौंका बनिए।।
जीने का है एक सहारा, उर उत्तम भावों को भरिए।
श्वासों का न कोई ठिकाना, सम्भल- सम्भल कर पग धरिए।।
कर्म साधना का वंदन हो, सच आभूषण धन तन दमके।
आलोकित हो श्रम का मोती, सुख का माथ पसीना चमके।।
साम्य भाव को उदित करो तुम, बोलो हरदम मीठी वाणी।
रखो भावना भाई चारा, सुख से प्रमुदित हो हर प्राणी।
दूर रहो लालच तृष्णा से, मन से कभी नहीं बुझ पाती।
करे पल्लवित सोच बुराई, खुशियों में यह आग लगाती।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




