साहित्य

भूख

मधु वशिष्ठ

जब हम उलझे थे
शरीर को स्वस्थ बनाने में।
समझ नहीं पा रहे थे
क्या घटाएं, क्या बढ़ाएं
अपने खाने में।
फल की कितनी मात्रा लें,
गर्मी में मेवें ले या कि ना लें।
बासी खाने को दूर भगाएं,
अधिक खाया गया तो कैसे पचाएं।
परेशान थे,
क्या खाएं जो शरीर को नुकसान न पहुंचाए।
जल्दी हजम हो जाए पर खाने में स्वाद भी आए।

उसी समय वह उलझे थे,
केवल खाना पाने में।
एक रोटी की खातिर
कितनी बोरियां उठाने में,
एक ही इच्छा मन में लिए,
2 दिन से भूखे सो गए आज तो कुछ मिल जाए बच्चों के लिए।
फल सब्जी हो या हो मिठाई,
कैलरी बड़े या घटे इसकी तो परवाह ही नहीं है भाई।
गुड़ मिले नमक मिले,
आज सुनाई ना पड़े भूखे बच्चों की रुलाई।

एक ही खाना दो लोगों को,
अलग-अलग क्यों देता है दिखाई?
हे भाई तूने यह भूख क्यों बनाई?

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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