
धू-धू कर जल रही जगत में,दानवता की आग।
नफरत का बाजार चतुर्दिक,खूनी खेलें फाग।।
जातिवाद का जहर घुला है, बिखरा हुआ समाज।
ऊंँच-नीच का भेद बहुत है, नफरत फैली आज।।
नफरत का बाजार गरम है, दिखे नहीं अनुराग।
पंथ और मजहब को लेकर,मचती भागम भाग।।
मँहगाई बढ़ती ही जाती,बदल रहा व्यवहार।
आज टूटते रिश्ते कैसे,कहांँ गया वह प्यार।।
मानवता का ल़ोप हुआ है, डूबे सब निज स्वार्थ।
बेईमानी मक्कारी है,कहीं नहीं परमार्थ।।
बिखर रहे संबंध आपसी, टूट रहा व्यवहार।
लोभ मोह में फंँसा मनुज है, नफरत की दीवार।।
जाति-पाँति अरु संप्रदाय पर,फैलाते उन्माद।
एकाकी जीवन जीता नर, ग्रसित हुआ अवसाद।।
हुई स्वार्थी दुनिया सारी, नफरत ही पैगाम।
नफरत का बाजार सजा है बिके नफरती जाम।।
सत्य राह के अनुगामी अब, दिखे नहीं संसार।
भारत माता तुम्हीं बता दो, कैसे हो उद्धार।।
लोग नफरती आग लगाकर करते स्वयं शिकार।
उनके मंसूबों को कुचलो, बांँटो सब में प्यार।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश



