
जिस संपत्ति के लिए
हम लड़ते रहते है
अपनों से ही दूर होते रहते
वो मुट्ठी की रेत भी हाथ से निकल जाती है
एक दिन सब यहीं
रह जाता है ।
दीवारें ऊँची कर ली हमने,
दिलों के दरवाज़े बंद कर लिए,
कागज़ के कुछ टुकड़ों की खातिर,
रिश्तों के धागे तोड़ लिए।
सोचा था ये सब हमारा है,
यही पहचान, यही सहारा है,
पर सच्चाई तो ये है एक दिन,
सब छोड़ जाना हमारा है।
जब अंतिम सफर पर चलेंगे हम,
न धन साथ होगा, न नाम रहेगा,
बस यादों में जो रिश्ते होंगे,
वही असली धन बनकर रहेगा।
तो क्यों ना आज ही समझ लें हम,
क्या सच में अपना है, क्या पराया,
संपत्ति तो यहीं रह जाएगी,
पर रिश्ता टूटे तो लौटकर ना आया ll
पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर




