
पसीने की महक से ही, महकता ये जहान है,
श्रमिक के हर क़दम में, छुपा सारा सम्मान है।
सुबह से शाम तक जो, थकन को भूल जाते हैं,
उन्हीं के हाथों से ही, सजा हर एक मकान है।
कभी पत्थर उठाते हैं, कभी दीवार गढ़ते हैं,
उनकी हर एक कोशिश में, बसा भारत महान है।
नहीं मिलता उन्हें अक्सर, उनके श्रम का पूरा फल,
फिर भी होंठों पे रहता, धैर्य का वरदान है।
फटी हथेलियों में भी, चमकता है सुनहरा कल,
यही तो सच्चा साहस, यही असली उड़ान है।
कहे “दया” झुको उनको, जो जग को राह देते हैं,
श्रमिक के हर पसीने में, छुपा ईश्वर का स्थान है।
*दया भट्ट दया, खटीमा (उत्तराखंड)*




