
काम करे जी तोड़ कर, फिर भी खुशियाँ दूर।
सदा अभावों में जिए भारत का मजदूर।
भूख प्यास को भूलकर, करता रहता काम।
उसके जीवन से कहीं , शब्द लुप्त आराम।।
हाथों में कारीगरी,परम पारखी नैन।
रचे सुदृढ़ अट्टालिका, श्रम सेवी दिन रैन।।
तापमान दिखता नहीं, बस दिखता है काम।
किंतु नहीं मिलता कभी, श्रम का समुचित दाम।।
श्रम के अमि से सिक्त वह, लिए परम संतोष।
रिक्त स्वयं हर वस्तु से, भरे अन्य का कोष।।
स्नेहलता पाण्डेय ‘स्नेह’




