साहित्य के सुरमयी पथिक: डॉ.अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ से प्रवासी साहित्यकार डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे का संवाद “लेखक की कहानी-लेखक की ज़ुबानी”
हिंदी साहित्य जगत में अनेक ऐसे रचनाकार हैं, जो शब्दों को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज-निर्माण का संकल्प मानते हैं। डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ ऐसे ही बहुआयामी साहित्यकार हैं, जिनकी लेखनी में संवेदना, संस्कार, छंद-सौष्ठव और सामाजिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। प्रशासनिक एवं प्रबंधकीय दायित्वों का सफल निर्वहन करते हुए भी आपने साहित्य साधना को निरंतर गति दी, जो आपकी कर्मनिष्ठा और सृजनधर्मिता का परिचायक है।

कवि, गीतकार, संपादक, समीक्षक और छंद गुरु के रूप में आपकी सक्रिय उपस्थिति हिंदी साहित्य समाज में विशेष सम्मान रखती है। “सुरमयी साँझ”, “नवोन्मेष”, “कवनीत-कुंज” जैसी कृतियाँ आपकी सृजनशीलता का प्रमाण हैं, वहीं “संचेतना के स्वर” जैसी साहित्यिक पत्रिका का संपादन आपकी साहित्य सेवा का महत्वपूर्ण अध्याय है।
आपको प्राप्त विविध राष्ट्रीय सम्मान यह सिद्ध करते हैं कि आपकी लेखनी केवल पाठकों के हृदय तक ही नहीं पहुँची, बल्कि साहित्यिक समाज द्वारा भी व्यापक रूप से सराही गई है। प्रस्तुत है हिंदी साहित्य के सजग प्रहरी, सृजनशील व्यक्तित्व और छंद साधक डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ से एक विशेष संवाद।
डॉ.ऋतु शर्मा ननंन पाँडे-
आपके साहित्यिक जीवन की शुरुआत कब और किन प्रेरणास्रोतों से हुई?
डा.अर्जुन गुप्ता “गूंजन-
मेरे साहित्यिक जीवन की नींव तब पड़ गई थी जब मैं कक्षा नौवीं (9th) में पढ़ता था। तब मैने मधुमास (वसंत) पर पहली कविता लिखा था। प्रथम प्रेरणास्रोत मेरे हिन्दी के अध्यापक आदरणीय स्व. हरिद्वार सिंह जी थे। कक्षा नौवीं- दसवीं में दिनकर जी की ‘रश्मिरथी’, बच्चन जी की ‘मधुशाला’, प्रसाद जी की ‘कामायनी’, ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से’, ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’, ‘बीती विभावरी जाग री’ इत्यादी काव्य रचनाओं को पढ़ कर मेरे बाल-मन पर काव्य की गहरी छाप पड़ी।
डॉ.ऋतु शर्मा ननंन पाँडे –
प्रशासनिक और प्रबंधकीय सेवाओं में व्यस्त रहते हुए साहित्य साधना को निरंतर कैसे बनाए रखा?
डॉ.अर्जुन गुप्ता “गुंजन“ –
प्रशासनिक और प्रबंधकीय सेवाओं में व्यस्तताओं के कारण साहित्य साधना पर अधिक ध्यान नहीं दे सका। लेकिन छंदमुक्त तुकबंदी करके कविता लेखन का कार्य किया करता था, जो फेसबुक पर “हिन्दी साहित्य के नये प्रतिमान’ समूह में संकलित व संग्रहित था।
तत्पश्चात् 2021 से समेकित तथा सुसंगठित रूप से छंदबद्ध काव्य साधना प्रारंभ किया जो अनवरत जारी है।
डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे –
आपकी काव्य कृतियों “सुरमयी साँझ”, “नवोन्मेष” और “कवनीत-कुंज” में कौन-से प्रमुख भाव और विचार केंद्र में रहे हैं?
डॉ अर्जुन गुप्ता “गुंजन“ –
“सुरमयी साँझ” मेरी प्रथम काव्य कृति है, जिसमें छंदबद्ध तथा छंदमुक्त प्रारंभिक रचनाओं का संग्रह है। इसमें प्रकृति, आध्यात्म, देशभक्ति, वंदना-प्रार्थना, शृंगार इत्यादि पर केंद्रित रचनाएँ संग्रहित हैं।
“नवोन्मेष” में उपरोक्त भावों के साथ भारतीय संस्कृति, संस्कार, सदाचार, सद्विचार, जीवन दर्शन, नारी विमर्श, प्रकृति, पर्यावरण, ओज, वात्सल्य व अन्य विविध संवेदनाओं पर केंद्रित भाव-व्यंजना की काव्यात्मक अभिव्यक्ति विभिन्न छंदबद्ध रचनाओं के माध्यम से करने का प्रयास मैने किया है।
“कवनीत कुंज” छंदबद्ध गीत संग्रह है, जिसमें गीत विधा में विभिन्न संवेदनाओं तथा संचेतनाओं के माध्यम से समाज में नवोत्कर्ष तथा नवीन विचारधारा संचारित करने का प्रयास मेरे द्वारा किया गया है।
डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे –
आप छंदबद्ध काव्य के समर्थ साधक हैं। आज के मुक्तछंद युग में छंद की प्रासंगिकता को आप कैसे देखते हैं?
डॉ. अर्जुन गुप्ता “गुंजन“ –
हम सब जानते हैं कि मुक्तछंद काव्य रचना आधुनिक काल के छायावादी कवि महाप्राण ‘निराला’ की देन है। उसके पहले के काल खंडों में भी छंदबद्ध काव्य रचनाओं की प्राथमिकता रही है। छायावादी अन्य कविताओं की अधिकांश रचनाएँ छंदबद्ध है। छायावादी युग के बाद मुक्तछंद में अधिकांश रचनाएँ सृजन करने की प्रथा ही चल पड़ी, जो आज तक बरकरार है। वर्तमान दशक में छंदों की प्रासंगिकता को कायम रखने के उद्देश्य से कतिपय साहित्यिक मंचों व छंद गुरुओं ने छंदों पर विशेष बल दिया है। उन्होंने साहित्य साधकों को छंदबद्ध सर्जन करने के लिए प्रेरित किया है, जो छंदों की प्रासंगिकता को उजागर करता है।
डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे –
“संचेतना के स्वर” पत्रिका के संपादक के रूप में आपका अनुभव कैसा रहा? संपादन और सृजन में क्या अंतर अनुभव करते हैं?
डॉ.अर्जुन गुप्ता “गुंजन“ –
“संचेतना के स्वर” (त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका) का संपादन तथा प्रकाशन मेरे द्बारा मई 2023 से किया जा रहा हैं, जिसमें साहित्य साधकों तथा शोध छात्रों/ छात्राओं की रचनायें ली जाती हैं तथा पत्रिका में प्रतिभागी सभी रचनाकारों को ई-सर्टिफिकेट (डिजिटल प्रमाणपत्र) तथा ई-पत्रिका नि:शुल्क प्रदान किया जाता है। जिन्हे इसकी हार्डकॉपी चाहिए उन्हें हार्डकॉपी सशुल्क डाक द्वारा घर पर पहुँचाया जाता है। अब तक कुल 14 अंक संपादित तथा प्रकाशित किये गये हैं। यह कार्य निरंतर जारी है। “संचेतना के स्वर” के संपादन के पीछे उद्देश्य यह है कि साहित्य में तथा समाज में नैतिक मू्ल्यों का जो क्षरण हो रहा है, उसे रोकने की दिशा में एक अभिनव प्रयास किया जाय, संचेतना जागृत की जाय। सारगर्भित, संदेशप्रद तथा संवेदनशील रचनायें ही समाज में संचेतना जागृत कर सकती हैं तथा राष्ट्र को सही दिशा दिखा सकती हैं। “संचेतना के स्वर” में साहित्य साधकों द्वारा रचित पुस्तकों की विस्तृत समीक्षा प्रकाशित करने का प्राविधान भी है। साहित्य साधना की दिशा में “संचेतना के स्वर” पत्रिका के संपादन का कार्य चुनौतीपूर्ण रहा है, जिसका अनुभव सुखद, सुफल व सार्थक है। प्रारंभ में इसके कवर पेज का निर्माण तथा कम्प्यूटर पर इसकी एडिटिंग का कार्य बहुत चुनौतिपूर्ण था। संपादक के रूप में मूलतः यह उद्देश्य रहा है कि नये व पुराने साहित्यकारों को एक मंच प्रदान करना, जिसमें वे स्वतंत्र रूप से अपनी भावाभिव्यक्ति कर सकते हैं। संपादन के अतिरिक्त साहित्य सर्जन करना अलग आवश्यक कार्य है, जिसका निर्वहन मैं माँ शारदा की कृपा से स्वतंत्र रूप से करता आ रहा हूँ और करता रहूँगा। संपादन कार्य सृजन का अभिन्न अंग है।
डॉ.ऋतु शर्मा ननंन पाँडे –
आपको अनेक राष्ट्रीय और साहित्यिक सम्मानों से अलंकृत किया गया है। इन सम्मानों को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
डॉ अर्जुन गुप्ता “गुंजन“ –
राष्ट्रीय और साहित्यिक सम्मान प्राप्त करना निस्संदेह गौरवान्वित करता है। आजकल ऐसे अनेक साहित्यिक मंच अस्तित्व में आ गए हैं जो शुल्क लेकर सम्मान-पत्र/ प्रशस्ति-पत्र प्रदान करते हैं। मैं ऐसे मंचों से कोसो दूर रहता हूँ। साहित्य साधना के नाम पर धन उगाही का कार्य अनेक नामी-गिरामी साहित्यिक मंच कर रहे हैं, जो निराशाजनक तथा निंदनीय हैं। मुझे जितने भी साहित्य-सम्मान प्राप्त हुए हैं वे सभी नि:शुक्ल हैं तथा एक सम्मान “कादम्बरी सम्मान” में मुझे धनराशि भी प्राप्त हुई है। उत्तर प्रदेश राज्य हिन्दी संस्थान, लखनऊ के द्वारा मेरी पुस्तक “नवोन्मेष” का प्रकाशन अनुदान के अंतर्गत किया गया है। मेरी पुस्तक “कवनीत-कुंज” का नि:शुल्क प्रकाशन “वागीश अंतर्राष्ट्रीय संस्था, यू.ए.ई.” द्वारा किया गया है तथा इसी संस्थान के द्वारा मुझे “वागीश सम्मान” भी प्राप्त हुआ है। अन्य राष्ट्रीय व साहित्यिक विशिष्ट समानों में “कबीर कोहिनूर सम्मान”, “राष्ट्र विभूति सम्मान”, ” कादम्बरी सम्मान”, “संपादक-रत्म सम्मान”, “श्री मुखराम माकड़ हिन्दी साहित्य सेवी सम्मान इत्यादि का नाम उल्लेखनीय है। ये साहित्यिक सम्मान साहित्य साधना व साहित्य सेवा की दिशा में मेरे द्वारा किए गए सार्थक प्रयासों का प्रमाण हैं, जो निरंतर उत्कृष्ट साहित्य सेवा करने के लिए मुझे प्रेरित करते हैं।
डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे –
वर्तमान हिंदी साहित्य में नवोदित रचनाकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
डॉ अर्जुन गुप्ता “गुंजन“ –
वर्तमान हिन्दी साहित्य में नवोदित रचनाकारों तथा नवांकुरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है विधानसम्मत रचना का सर्जन करना। उन्हें झूठी प्रशंसा तथा वाहवाही से बचना चाहिए। पैसा देकर सम्मान-पत्र, प्रशस्ति-पत्र प्राप्त करने से बचना चाहिए। उन्हें अपने विवेक का इस्तेमाल करके विशुद्ध साहित्यिक मंच का चुनाव करना चाहिए जहाँ उन्हें विधान तथा विधा का सही ज्ञान प्राप्त हो सके तथा जहाँ साहित्य साधकों की रचनाओं की सम्यक, सार्थक व विधानसम्मत समीक्षा की जाती हो। जहाँ उन्हें उचित मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।
डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे –
आपकी दृष्टि में कविता केवल सौंदर्यबोध है या सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी?
डॉ अर्जुन गुप्ता “गुंजन“ –
मेरी दृष्टि में कविता दोनों है — सिर्फ सौंदर्यबोध नहीं, सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, कविता ‘हृदय की मुक्तावस्था’ है।
कविता सौंदर्यबोध है। कविता लय, छंद, अलंकार, बिम्ब और प्रतीक जैसे तत्वों का उपयोग करके भावनाओं को तराश कर कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है, जो पाठकों में सौंदर्य और आनंद की अनुभूति कराती है। निराला जी की “जूही की कली” या महादेवी वर्मा की “मैं नीर भरी दुख की बदली” में सामाजिक संदेश नहीं, शुद्ध सौंदर्य का अनुभव होता है।
कविता सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है:
कविता समाज में व्याप्त अत्याचार, शोषण, असमानता और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती है।
कवियों ने ऐतिहासिक मोड़ों पर जैसे स्वतंत्रता आंदोलन या नारी चेतना में कविता के माध्यम से जनता को प्रभावित किया। सौंदर्य और परिवर्तन अलग-अलग नहीं हैं। सुंदर कविता ही सबसे ज्यादा प्रभावशाली परिवर्तन लाती है।
“मधुशाला” पीने-पिलाने की बात लगती है, पर बच्चन ने उससे पूरे मध्यवर्ग को हिम्मत दी। “अग्नि पथ” हरिवंश राय बच्चन की कविता है, पर लाखों लोगों के लिए जीवन का मंत्र बन गई।
सौंदर्य कविता का शरीर है, सामाजिक परिवर्तन उसकी आत्मा। एक बिना दूसरा अधूरा।
डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे –
“वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी” मंच के माध्यम से आप साहित्य और छंद साधनाके लिए क्या कार्य कर रहे हैं?
डॉ अर्जुन गुप्ता “गुंजन“ –
“वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी” मंच के माध्यम से हम साहित्य और छंद साधनाके लिए निम्नलिखित कार्य कर रहे हैं –
* विगत 5 जनवरी 2023 से ह्वाट्सएप पर ऑनलाइन संचालित।
* हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी भाषा के उन्नयन तथा संवर्धन के क्षेत्र में अभिनव सेवा-भावना का उद्देश्य लेकर इस मंच (वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी) का गठन किया गया है।
* इस मंच से संचालित “छंदों की पाठशाला/ कार्यशाला” में प्रतिदिन वैदिक छंद सिखाया जाता है। साहित्य साधकों की रचनाओं की सम्यक समीक्षा करके तथा मार्गदर्शन दे कर छंद सीखाने का कार्य सम्पन्न किया जाता है तथा प्रतिदिन 3 सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों को सम्मान-पत्र से सम्मानित किया जाता है।
* अब तक कुल 91 (इकानबे) छंद सिखाया गया है तथा यह कार्य निरंतर जारी है।
* छंदों के अतिरिक्त सप्ताह में एक दिन वृहस्पतिवार को गद्य विधा के अंतर्गत लघुकथा, व्यंग्य, भाव-पल्लवन, संस्मरण, यात्रा-संस्मरण, पत्र-लेखन, निबंध, आलेख तथा पुस्तक-समीक्षा भी सिखाया जाता है।
* प्राचीन विधा कहमुकरी तथा नवीन विधा मुक्तछंद में भी सर्जन करना सिखाया जाता है।
* मुक्तक तथा गीत विधा में भी सर्जन करना सिखाया जाता है।
* संचेतना के स्वर (त्रैमासिक साहित्यिक ई-पत्रिका) का संपादन तथा प्रकाशन भी विगत मई 2023 से किया जा रहा हैं, जिसमें साहित्य साधकों तथा शोध छात्रों/ छात्राओं की रचनायें ली जाती हैं तथा पत्रिका में प्रतिभागी सभी रचनाकारों को ई-सर्टिफिकेट (डिजिटल प्रमाणपत्र) तथा ई-पत्रिका नि:शुल्क प्रदान किया जाता है। जिन्हे इसकी हार्डकॉपी चाहिए उन्हें हार्डकॉपी सशुल्क डाक द्वारा घर पर पहुँचाया जाता है।
* अब तक कुल 14 अंक संपादित तथा प्रकाशित किये गये हैं। यह कार्य निरंतर जारी है। संचेतना के स्वर के संपादन के पीछे उद्देश्य यह है कि साहित्य में तथा समाज में नैतिक मू्ल्यों का जो क्षरण हो रहा है, उसे रोकने की दिशा में एक अभिनव प्रयास किया जाय, संचेतना जागृत की जाय। सारगर्भित, संदेशप्रद तथा संवेदनशील रचनायें ही समाज में संचेतना जागृत कर सकती हैं तथा राष्ट्र को सही दिशा दिखा सकती हैं। संचेतना के स्वर में साहित्यकारों की पुस्तकों की विस्तृत समीक्षा प्रकाशित करने का भी प्राविधान है।
* मार्च 2025 से हिन्दी साहित्य का इतिहास विषयक राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठियाँ निरंतर संचालित की जा रही हैं। अप्रैल 2026 तक कुल 15 संगोष्ठियाँ आयोजित की जा चुकी हैं तथा यह कार्यक्रम भी निरंतर जारी है। इसमें प्रतिभाग करने वाले सभी वक्ताओं को प्रमाण-पत्र जारी किया जाता है।
* साहित्य-साधना की दिशा में सभी जागरुक साहित्य-साधकों को यह मंच सिखने का सुनहरा अवसर प्रदान करता है तथा उन्हें प्रेरित और प्रोत्साहित करता है।
डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे –
आने वाले समय में आपकी कौन-कौन सी साहित्यिक योजनाएँ या नई कृतियाँ पाठकों को देखने को मिलेंगी?
डॉ अर्जुन गुप्ता “गुंजन“ –
आने वाले समय में मेरी 2 नई कृतियाँ पाठकों को देखने और पढ़ने को मिलेंगी – “नील गगन के पंछी” (छंदबद्ध गीत संग्रह) तथा दूसरा “बहका बसंत है” (छंदबद्ध काव्य संग्रह)। मेरे द्वारा लघुकथा तथा कहानी लेखन भी जारी है।
वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी का वेबसाइट पोर्टल उपलब्ध करवाने की भी योजना है। अन्य साहित्यिक गतिविधियाँ भी संचालित की जायेंगी, यथा हिन्दी भाषा का उद्भव और विकास, नवगीत लेखन, अलंकार, रस, शब्दों के भेद, मंचीय कवि-सम्मेलन तथा अन्यान्य साहित्यिक कार्यक्रम।
साक्षात्कारकर्ता
डॉ ऋतु शर्मा ननंन पाँडे
प्रवासी साहित्यकार व
अध्यक्ष अंतरराष्ट्रीय हिन्दी संगठन
RituS0902@gmail.com




