साहित्य

मजदूर हूं मैं

सौ, भावना मोहन विधानी

जिंदगी लेती है रोज नई परीक्षा,
सुबह हो या शाम रहती है चिंता।
आज कोई काम मिल जाए मुझे,
तो परिवार के पेट की आग बुझे।

सर्दी गर्मी धूप या बारिश की मार,
छोड़ नहीं सकता जिम्मेदारी का भार।
परिवार की याद को दिल में बसाए,
काम करता हूं आंसुओं को दबाए।

हर इमारत हर घर मेरे हाथों से गढ़ता,
कुछ कर दिखाऊंगा मन में है दृढ़ता।
मेहनत से बदल दूंगा अपना दौर,
अपने हक के लिए करता हूं शोर।

हाथों में छाले माथे पर पसीना बहता,
फिर भी जीवन में कभी नहीं हूं रुकता।
मन में एक आस है मुझे मिले सम्मान,
मैं मजदूर हूं मेरी भी हो कोई पहचान।

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।

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