
तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय हो गया।
भावना के आंगन आकर जो बस गया।
वह अपने वचनों की पक्की हरदम है,
जीवन आस वह तुमसे तो लगा गया।।
मतवाले हद सपनों में ही खोए रहते।
आपस में सम्बल देकर पथ प्रशस्त करते।
सौरभ पुरवा साक्षी उत्सुक स्वागत में,
सूने कोने महके- महके शुभिता गहते।।
सबकी ऑखों से छिपकर बातें करते।
मन आनंदित हो जाता बतियों पे मरते।
सारे दृश्यम मादक मोहक सुखमय हो,
दो उर मिलकर खुश हो फिर ऑंसू झरते।।
तुम्हे देखकरअंकुरित प्रणय भाव जगा है।
प्रेम ही जीवन का सत्य कहने लगा है।
कलयुग मे यह भावना झूठ लग रही है,
बातों में फंसा आज वही दे रहा दगा है।।
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
- डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




