
साँझ ढली, गाथा गाए, दीपक की लौ अनुरागी।
थका दिवस घर लौट रहा,
राह देखे आशा द्वार।
तुलसी चौरा खुश होता,
महकता है घर परिवार।
नेह-धार बहती घर-घर,
ममता बन गई सुहागी।
साँझ ढली, गाथा गाए, दीपक की लौ अनुरागी।
सूनी राहें बोल उठीं ,
फिर जागता नव विश्वास।
रोटी की गर्म गंध में,
महका श्रम का मधुमास।
टूटे मन में दीप जले ,
जब मुस्काई हर त्यागी।
साँझ ढली, गाथा गाए, दीपक की लौ अनुरागी।
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे,
एक ज्योति रही पहचान।
प्रेम-पवन बहती जग में,
मिटते हैं सभी अवरोध।
मानवीय वीणा झंकृत,
करुणा बन गई पुजारिन।
साँझ ढली, गाथा गाए, दीपक की लौ अनुरागी।
स्वरचित
डाॅ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




