साहित्य
बहू मारते धन के लोभी

किरण कुमारी ‘वर्तनी’ जमशेदपुर
बहु मारते धन के लोभी, विस्मय वाली बात।
कड़ा कानून आज बने बस,हो निर्णय रातों रात।।
जुल्म बहु पर ढ़ानेवाले हैं , भरते दुख से कोष।
निरपराध की क्या है गलती, है यह किसका दोष।।
शस्त्र सजाकर बैठे डोली, अबकी बेटी तात।
बहु मारते धन के लोभी , विस्मय वाली बात।।
चुप दहेज का दंश सहे क्यों ,हो जाए तैयार ।
अपनी रक्षा अपने हाथों , लड़े आर या पार।।
केश बने फंदा नैन जाल, दीजिए यूँ घात।
बहु मारते धन के लोभी ,विस्मय वाली बात।।
निज बेटी प्राणों से प्यारी, करते प्रेम अथाह।
जो अपना सब तज कर आई , उससे रखते डाह।।
लक्ष्मी रूप बहू देवी सम, हो जाए यह ज्ञात।
बहू मारते धन के लोभी, विस्मय वाली बात।।




