
किसी भी राष्ट्र की नियति केवल उसकी सीमाओं या सरकारी नीतियों से तय नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों के सामूहिक संकल्प और पुरुषार्थ से परिभाषित होती है। आज जब हम ‘विकसित भारत का सपना देख रहे हैं, तो यह केवल एक आर्थिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक पुनर्जागरण का आह्वान है। प्रश्न यह नहीं है कि भारत विकसित बनेगा या नहीं, प्रश्न यह है कि उस विकास की यात्रा में हमारी व्यक्तिगत आहुति क्या होगी?
विकास के स्तंभ, नीतिगत और संरचनात्मक प्रयास,
भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए हमें बहुआयामी मोर्चों पर युद्धस्तर पर काम करना होगा। इसके मुख्य स्तंभ हैं,नवाचार और तकनीकी नेतृत्व जहाँ अब हम केवल ‘अनुकरण’ करने वाले देश नहीं रह सकते, हमें ‘नूतन अन्वेषण'(इनोवेशनिन) के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करना होगा। ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) अंतरिक्ष विज्ञान और ‘नवीकरणीय ऊर्जा’ (ग्रीन ईनर्जी) जैसे क्षेत्रों में निवेश और शोध हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। शिक्षा और कौशल विकास हमारी विशाल जनसंख्या हमारी सबसे बड़ी पूंजी है बशर्ते वह कुशल हो। नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ ‘व्यावसायिक प्रशिक्षण’ को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलानी होगी।
बुनियादी ढांचे का कायाकल्प ‘गतिशक्ति’ जैसी योजनाएं परिवहन और ‘तार्किक प्रबंधन’ की लागत घटाने में मील का पत्थर हैं। आधुनिक बंदरगाह, ‘द्रुतमार्ग’ और ‘अंकीय आधारभूत संरचना’ ही आर्थिक क्रांति की रीढ़ बनेंगे। सामाजिक समावेश विकास तब तक अधूरा है जब तक उसका लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक न पहुंचे। स्वास्थ्य, पोषण और लैंगिक समानता’ के बिना ‘विकसित भारत’ की कल्पना बेमानी है।
क्या हम भी निभा सकते हैं अहम भूमिका?
अक्सर हम सोचते हैं कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनेताओं, वैज्ञानिकों या उद्योगपतियों का काम है। लेकिन हकीकत यह है कि एक विकसित राष्ट्र, विकसित नागरिकों का समूह होता है। एक आम नागरिक के रूप में हमारी भूमिका निर्णायक है,कर्तव्य-बोध का जागरण हम अधिकारों की बात तो मुखर होकर करते हैं लेकिन कर्तव्यों पर मौन साध लेते हैं। ‘कर’ की ईमानदारी से अदायगी, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और कानून का पालन करना विकास की पहली शर्त है। स्थानीय का सम्मान, जब हम स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं तो हम सीधे तौर पर अपने देश के लघु उद्योगों और कारीगरों को सशक्त बना रहे होते हैं। आर्थिक स्वावलंबन की शुरुआत हमारे ख़रीदारी के निर्णयों से होती है। सतत जीवनशैली, विकसित भारत का अर्थ केवल सिमेंट-कंक्रीट के निर्जीव ढांचों’का समूह नहीं है; जल संरक्षण, ऊर्जा की बचत और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता हमारी नागरिक जिम्मेदारी है। अंकीय और सामाजिक साक्षरता’ सूचना के इस युग में भ्रामक ख़बरों को रोकना और तकनीक का सही उपयोग करना भी राष्ट्र सेवा का ही एक रूप है।
उद्धरण की गहराई,,,संचिकाएं बनाम ज़मीनी हक़ीक़त
“राष्ट्र निर्माण का कार्य केवल सरकारी संचिकाओं (फ़ाइलों) में नहीं, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों के दिलों और उनके कर्मों में संपन्न होता है।” यह वाक्य मात्र एक सुविचार नहीं बल्कि नागरिक चेतना का वह मंत्र है जो किसी भी विकासशील देश को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में खड़ा करने की शक्ति रखता है। इसके पीछे के दर्शन को समझें,,संचिकाएं बनाम ज़मीनी हक़ीक़त सरकारी संचिकाएं नीति निर्माण’ का प्रतीक हैं। वे राह दिखाती हैं, धन आवंटित करती हैं और योजनाएं बनाती हैं, लेकिन कोई भी संचिका खुद चलकर सड़क नहीं बना सकती, न ही वह किसी कुपोषित बच्चे का पेट भर सकती है। संचिकाएं केवल ‘इच्छाशक्ति’ का लिखित दस्तावेज हैं जबकि नागरिकों के कर्म उस इच्छाशक्ति का ‘साक्षात प्रकटीकरण’हैं। जब एक ‘अभियंता’ ईमानदारी से पुल बनाता है या एक सफ़ाईकर्मी अपना कर्तव्य समझकर कचरा उठाता है, तब वह संचिका हकीकत में बदलती है।
‘दिलों’ में संकल्प की भूमिका, जब तक राष्ट्र के प्रति प्रेम और ज़िम्मेदारी का भाव नागरिकों के हृदय में नहीं होगा, तब तक कोई भी कानून प्रभावी नहीं हो सकता। नैतिकता से भ्रष्टाचार फ़ाइलें बंद करने से नहीं, बल्कि नागरिक के ‘हृदय’ में ईमानदारी के उदय से ख़त्म होगा। एकजुटता से जब देश के 140 करोड़ लोग दिल से यह महसूस करते हैं कि देश की संपत्ति उनकी अपनी है, तब सार्वजनिक तोड़-फोड़ और हिंसा का अंत होता है। ‘कर्मों’ की शक्ति, राष्ट्र निर्माण छोटे-छोटे रोजमर्रा के कामों का योग है एक छात्र के रूप में पूरी निष्ठा से पढ़ाई करना ताकि भविष्य में देश को एक विशेषज्ञ मिले, एक ‘उद्यमी’ के रूप में रोजगार के अवसर पैदा करना और भारत में निर्मित उत्पादों को विश्व स्तर पर ले जाना।
भारत को 2047 तक विकसित बनाने का लक्ष्य केवल सरकारी आंकड़ों का खेल नहीं है, इसमें जन-भागीदारी’ सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षा में सरकारी भूमिका विद्यालय बनाना और बजट देना है, जबकि नागरिक का काम सीखना, नवाचार करना और साक्षरता फैलाना है। स्वच्छता में सरकार का काम कूड़ेदान लगाना और अपशिष्ट प्रसंस्करण संयंत्र’ बनाना है, जबकि नागरिक का काम कचरा न फैलाना और गीला-सूखा कचरा अलग करना है। अर्थव्यवस्था में सरकारी नीतियाँ बनाना और ब्याज दरें तय करना है, जबकि नागरिक का काम स्वदेशी अपनाना, निवेश करना और कौशल सीखना है।
विकसित भारत का मार्ग चुनौतियों से भरा है लेकिन असंभव नहीं। ‘सकल घरेलू उत्पाद’ के आंकड़ों और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ हमें अपनी कार्य-संस्कृति में भी बदलाव लाना होगा। हमें ‘चलता है’ वाली मानसिकता को त्यागकर उत्कृष्टता’ को अपनाना होगा। जब एक किसान अपनी उपज बढ़ाने के लिए नई तकनीक अपनाता है, जब एक शिक्षक पूरी निष्ठा से भविष्य की पीढ़ी गढ़ता है और जब एक युवा ‘नवाचारी लघु उद्योग’ के जरिए रोजगार सृजन करता है, तो वह ‘विकसित भारत’ की नींव रख रहा होता है।
यह समय उदासीनता का नहीं उत्साह का है। आइए हम सब मिलकर इस महायज्ञ में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। संक्षेप में, सरकार केवल एक’संचालक’ की तरह है, लेकिन असली संगीत ‘वाद्ययंत्र’ बजाने वाले नागरिकों के सामूहिक प्रयास से निकलता है। जब हर व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का संकल्प लेता है, तभी राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव होता है।




