
अरे, सुनते हो हनी ।
क्या है स्वीटी ?
मेरी बड़ी बहन स्नेह की शादी की पचासवीं शादी की साल गिरह है । कोरोना वायरस के महासंकट में
लॉकडाउन में कोई कहीं नहीं आ – जा सकता है । अगर कोरोना की बीमारी नहीं आयी होती तो वे बड़े
धूमधाम से अपनी शादी की स्वर्ण जयंती मनाते ।
इसी बहाने हम अपने मायके वालों और दीदी के ससुरालवालों , रिश्तेदारों से मिल लेते लेकिन यह मौका तो हाथ से कोरोना के लॉकडाउन ने निकाल दिया है । कई सालों से हम उनसे मिले भी नहीं हैं ।
” ठीक है फोन से बधाई दे देते हैं ।”
” वो तो हम दे ही देंगे ।”
लेकिन उनका यह भव्य समारोह ज़ूम पर आज हो रहा है ।
अमेरिका से उनकी डाक्टर बेटी रूबी ने ही एक दिन पहले निमंत्रण व्हाट्सएप पर भेज दिया था । देखो यह लिंक और पासवर्ड नमंबर भी है ।
” तुम मोबाइल पर इस लिंक पर पासवर्ड नमंबर डाल दो । ”
” ठीक है ।”
” दीदी के घर अलीगढ़ में तो 2 दिन से जश्न ससुरालवालों का पूरा कुनबा मना रहा है । मुंबई से बड़ी ननद ने आडियो से आशीषें गाकर भेजी हैं ,लो
सुनो –
देवी मैया की लंबी आशीष
जोड़ी तेरी अमर रहे । ”
” हा , लो जुड़ गया लिंक ।”
” चलो हम दोनों देखते हैं ।”
” हाँ , जरूर ।”
” अरे ! वाह , यहाँ तो जीजा जी और जीजी की बचपन से लेकर अभी तक की सारी यादें कितनी खूबसूरती से वीडियो में कैद कर परोसी हैं । ”
” तुम तो पचास साल से ज्यादा पुरानी यादों में खो गयी हो ।”
” हाँ , देखते जाओ आगे क्या – क्या अजूबे दिखने वाले हैं । देखो , दीदी की जयमाला की फोटो में हम सब भाई बहन भी ।”
“अरे , तुम तो पहचान में नहीं आ रही हो , इतनी छरहरी काया ! ”
” हाँ , इंसान तो बचपन से ताउम्र सूरत , सीरत , रंग जो बदलते रहते हैं । वो कहावत भी गिरगिट की
तरह रंग बदलना। …. । इसे देख के बचपन के गुजरे जमाने याद आ गए ।
यह देखो सिल्वर फ्रेम में गढ़ा सफेद रेश्मी साटन के कपड़े पर लाल रंग की स्याही से लिखे प्रिंट में ‘अभिनन्दन- पत्र ‘ । बारात आने पर वर पक्ष की तारीफ में बारातियों के सामने हमारे बड़े भाई विजय ने पढ़ा था और पिताजी जी ने यह दोहा लिखा था –
‘ स्नेहलता ‘ अरु ‘ अनिल ‘का , मिलन हुआ शुभ आज ।यह देखन स्नेही चले , छोड़ – छाड़ सब काज ।”
और भी पद ——।
पढ़ने के बाद भाई ने यह सिल्वर फ्रेम में मढ़ा अभिनन्दन पत्र दूल्हे को भेंट कर के सारे बारातियों को भेंट में दिया था । माता – पिता ने कितने इंतजार के बाद इस शुभ दिन को अपनी लाडली बड़ी बेटी की शादी करने का फर्ज अदा किया था जो।
इसे भी देखो सुनहरे फ्रेम में जड़ा रेशमी सुनहरे कपड़े पर पिताजी के मनोभावों से गढ़ा गद्यात्मक
‘ प्रत्याभिनन्दन – पत्र ‘ । हमारे पिताजी ने वर पक्ष के स्वागत में अपने पाँच भाइयों को साथ ले कर ये पत्र पढ़कर सभी बारातियों को अभिभूत कर दिया था। आज के दिन ही प्रीत के आँगन में दो परिवार आपस में
जुड़े थें । ”
” हाँ , अरे वाह ! लगता है उस जमाने में हिंदी साहित्य की रसानुभूति चरम पर थी ।”
” हाँ , यह परंपरा , सभ्यता का ही चलन था , बारातियों को बहुत पसंद आया था । ”
“आजकल तो यह चलन समाज से गायब ही हो गया है ।ऑकेस्ट्रा ही कान फोड़ता रहता है । ”
” नयी पीढ़ी को ऐसा ही पसन्द है ।”
“हमें नयी पीढ़ी को इस रचनात्मक संस्कृति से परिचित कराना होगा ।”
“हाँ हनी , बहन की शादी में बारात तीन दिन तक ससुराल में ठहरी थी । खूब बारातियों की खातिरदारी हुई थी , मिठाइयों की बहार लगी थी , जैसे सेब , अमरूद , आम , अंजीर , कीवी आदि फलों की बर्फी देखो फोटो में बारातियों की थालियों में कैसी ठूँस – ठूँस कर भरी हैं । ”
” हाँ , कैसे टूट पड़े हैं खाने के लिए ।”
” सारे बारातियों को ऋषिकेश की गंगा में नहाने का पुण्य तो लड़कीवालों को ही जाता है, हाँ ! तुम्हारी शादी के सारे बाराती मेरा ही तो गुणगान गाते हैं कि बहू ने ऋषिकेश की गंगा नहला दी ।”
” हम्बे , हमारी बारी में तो दो ही दिन में शादी हो गयी थी । दूसरे दिन विदाई …..।”
” तुम्हीं तो कह रहे थे कि शादी करने की छुट्टी कंपनीवाले नहीं दे रहे थे , तुम्हें फुर्सत शादी करने की थी ही कहाँ … ? ”
” हाँ , किस्मत से बड़ा कोई नहीं है, तुम जो मिल गयी ।”
” न , न करते भी शादी का लड्डू चाहिए था ।
यह देखो दीदी की विदाई की फोटो , कैसे माँ -पिता के संग – साथी अपने जिगर के टुकड़े की विदाई पर रो रहे हैं । सुनहरे गोटे से जड़ा सफेद साटन पर लाल -लाल अक्षरों में लिखा विदाई – गीत कैसे फोकस किया है । मेरी माँ ने अश्रु धारा बहाते हुए दीदी को सीख दी थी –
मन की ममता करुणामय है ,
नयनों की भाषा रोती है ।
मात -पिता के गृह प्रांगण से
बेटी आज विदा होती है ।
बेटी ! अब तो पतिगृह को ही ,
प्रेम सदन बनाना ।
धर्म – कर्म की दिव्य ज्योति से ,
सास , ससुर ननद देवर को गले लगाना ।
माँ के गीत की ये पंक्तियाँ दीदी ने अपने हृदय में धारण कर ली थी । उन्होंने अपने ससुराल में अपने सुख को भूल कर सभी देवर , जेठ ननदों , ससुर श्री , सास श्री के सुख – दुख में हमदर्द बन के प्रेम , खुशी को लुटाती रही हैं ।
ये देखो दीदी के पोता – पोती धेवता – धेवती, ननद -ननदोई की गीतों की और नृत्य की वीडियो । कैसे सब बेटा , बहू , बेटी दामाद सबके बच्चे मिलजुल कर नाच कर , बन्ना – बन्नी गा कर उनके परिणय की गोल्डन जुबली मना रहे हैं । आज उनके प्रेम से ही पीहर और ससुराल का सारा कुनबा जुड़ा है यहाँ पर । यह छोटी – सी छुटकी इतनी बड़ी हो गयी , कनाडा में उनकी भांजी रहती है , यह उनका बेटा बंगलुरु में ।
” वीडियो को देख के तो लग रहा सारे रिश्तेदार ड्राइंगरूम में समा गए ।”
” मुस्कुराते हुए हा , सुनो हनी , दीदी को जब – जब उलझनें घेर लेती थी , तब दीदी को माँ की यह पंक्ती याद आ जाती थी –
पतिगृह को प्रेम सदन बनाना है और उन्होंने ये वचन निभाए भी । ”
“हाँ , प्रेम ही सब समस्याओं का समाधान है । प्रेम चुम्बक की तरह सबको अपने साथ चिपकाए रखता है । ”
” समय कैसा तेजी से भाग रहा है ,सारे क्षण चलचित्र की तरह जीवंत लग रहे ।”
” हाँ ।”
” कोरोना के लाकडाउन में सहमे हुए लोगों का आना – जाना बंद है लेकिन जूम पर घर में बंद सब अपनों को देखकर ऐसा लग रहा है कि सारे जने दूर होकर भी सारे रिश्तेदार हमारे पास में ही बैठे लग रहे हैं और वे वैवाहिक जीवन की वीडियो देख के अपने – अपनी शुभकामनाएँ लिख -बोल के आशीषें देने में लगे हैं , ऐसा लग रहा है फिर से शादी ही हो रही हो हमारी बड़ी बहन की ।”
” सचमुच मुझे भी ऐसा ही लगा ।”
” मुझे तो आज की तकनीकी, इंटनेट , जूम के एप पर गर्व हो रहा है , जिसने यह उत्सव जोर – शोर से मना दिया और हम सब देश – विदेश में बिखरे रिश्तेदारों को जूम पर इकट्ठा कर दिया ।”
” हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आए ।”
” लाकडाउन में तकनीकी ने अपनों को करीब ला दिया है। कोरोना काल में रिश्तों में सबसे अद्भुत सामंजस्य भी हमने बिठा लिया । देखो आयोजक रूबी का परिवार कैसे हमें अपना नमस्कार कर रहा है ? ”
हाँ – हाँ , चलो हम भी अपनी प्यारी दीदी , जीजा जी को इस पावन बेला पर यहीं बैठे के सप्तपदी के पावन बंधन की पचासवीं वर्षगाँठ पर शुभकामनाएँ दे दें ।
मुबारक है शादी का स्वर्ण जयंती पर्व
ताउम्र सलामत रहे यह जोड़ी ।
जन्मों- जन्मों तक बंधन बरकरार रहे ।
युगाब्द तक अटूट रहे ये जोड़ी …….।
डॉ मंजु गुप्ता , वाशी , नवी मुंबई




