साहित्य

लिखा तुकांत-इत्

गीतिका छंद

यादों की अलकावलि पर जब, महका पावन प्रीत लिखा।

सांसों की सरगम ने तब ही, जीवन का संगीत लिखा।।

 

कांटों की राहों पर चलकर, पायी जिसने मंज़िल थी,

समय चक्र ने उस राही का, जग में पावन जीत लिखा।।

 

छूट गया जो पीछे कल था, उसकी बातें छोड़ो अब,

आने वाले कल ने देखो, नया सुहाना मीत लिखा।।

 

मन के सूने कोलाहल में, गूँज रही जो पाँचे थी,

सच्चे साधक ने अंतस में, हरदम पावन गीत लिखा।।

 

भीड़-भाड़ की इस दुनिया में, कौन यहाँ पर अपना है,

वक्त पड़े पर जिसने समझा, उसने ही नव-रीत लिखा।।

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