
दादा – दादी आए हैं, ढेरों खिलौने हैं लाए।
बैग से उनके निकल रहे हैं, लड्डू,मठरी और मिठाई,
जिसकी ख़ुशबू हम सबको है भाए।
रंग बिरंगे स्वेटर मफ़लर, दादी जी के प्यार के तोहफे,
हम सबको गुदगुदाते हैं।
उनके संग में खेल कूद कर अपना समय बिताते हम,
माँ को नहीं सताते हम,
मज़े-मज़े में दादा-दादी संग ,
ख़ूब लाड़ लड़ाते हम।
उनकी बातों और कहानियों से कितना ज्ञान पा जाते हम।
छुट्टियों का कुछ पता न चलता, कब आईं और चलीं गईं,
दादा-दादी का सानिध्य जो पाते, कितने किस्मत वाले हम।।
रचनाकार –
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन सद्यः निःसृत,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।



