साहित्य

अंधेर नगरी,चौपट राजा 

डॉ. शीलक राम

1.)आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुये सिस्टम में मेहनत, प्रतिभा, कानून ,और योग्यता के बल पर सफलता प्राप्त करने का प्रयास ऐसा ही है, जैसे कानफोडू तेज संगीत के बीच में अपनी सरकंडे से बनाई हुई पीपनी बजाकर संगीत उत्पन्न करने के दावे करना।ऐसी महामूर्खता करके किसी भी क्षेत्र में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। किसी भी क्षेत्र के प्रताड़ित,दुखी, हताश, परेशान और विफल व्यक्ति को यह सूत्र अपने मोबाईल या अपनी खोपड़ी में (यदि कुछ बची हुई हो तो) डाल लेना चाहिये। हरिश्चंद्र की ये पंक्तियां याद रखो -अंधेर नगरी,चौपट राजा।टके सेर भाजी,टके सेर खाजा।जिनकी खोपड़ी में तर्क,चिंतन, विचार, सूझबूझ और विवेक भरे हुये हों,वो लोग उनसे रोजगार, शिक्षा, न्याय, व्यवस्था, सुरक्षा,आवास और चिकित्सा मांग रहे हैं,जिनकी खोपड़ियों में निरा गोबर, पेशाब और सड़ा हुआ कूड़ा-कर्कट भरा हुआ है।

युरोपीयन टाईम्स के अनुसार भारतीय मतदाता सबसे मूर्ख हैं,जो अनपढ़ नेताओं को वोट देते हैं।टाईम्स अखबार महोदय,भारत में तो क्या अनपढ़ और क्या पढ़े लिखे – अधिकांश नेता धूर्त , भ्रष्ट और धोखेबाज प्रवृत्ति को लिये हुये हैं।कुछ तो देशी- विदेशी विश्वविद्यालयों से उच्च -शिक्षित भी हैं। भारत में अनपढ़ नेता तो भ्रष्ट हैं ही, उच्च शिक्षित नेता और भी बड़े स्तर के भ्रष्ट हैं। यहां तो अनपढ़ सरदार के अनेकों उच्च- शिक्षित गुलाम भी मौजूद हैं। अनपढ़ नेताओं की चापलूसी और गुलामी करते समय कहां पर चली जाती है इनकी उच्च- शिक्षा?

2.)किसी के लिये सेवा, सहयोग और प्रेम आदि करने से आपको कुछ वापसी में मिल जायेगा,यह बात जितना जल्दी अपनी खोपड़ी से निकाल दोगे, उतना ही बढ़िया रहेगा। इससे आपका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि आपने अतीत में जो सेवा, सहयोग और प्रेम किया है, आपको बाद में पछताना नहीं पड़ेगा।इनको करते समय ही तृप्ति, संतोष और आनंद का अहसास कर लो।यह जीवन की सच्चाई है कि आपको हर प्रेम के बाद धोखा मिलेगा।हर सहयोग के बदले आपको विश्वासघात मिलना सुनिश्चित है।हर सेवा के बदले बाद में या उसी समय आपको बदनामी का मिलना अवश्यंभावी है। भौतिक संसार में कोई भी व्यक्ति निःस्वार्थी बनकर नहीं जी सकता है।इसीलिये अब्राहमिक मजहबों में पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लामी आदि सभी अपना स्वार्थ देखकर काम करते हैं। पिछली सदियों में सनातनियों को भी यह महामारी लग चुकी है।ये भी उनकी नकल करके उपयोगितावादी बन चुके हैं।काम निकालो और संबंध तोड़ दो। किसी के समीप केवल अपने काम निकालने के लिये आओ और जब काम निकल जाये तो धोखा देकर भाग खड़े हो। फिर किसी अन्य को पकड़ लो। संसार में एक मूर्ख की तलाश करोगे तो सैकड़ों मिल जायेंगे।यूज एंड थ्रो।उपयोग करो और छोड़ दो।पूरा संसार ही जब इस तरह का बन चुका है तो आपके अकेले सत्यनिष्ठ होने, प्रेमपूर्ण होने, करुणामय होने, सहयोगी होने से क्या होगा? इससे केवल आपके जीवन में समस्याओं का अंबार खड़ा हो जायेगा।आप हर समय परेशान, हताशा और चिंतित रहना शुरू कर दोगे।जब सामने वाला प्रेमपूर्ण, सेवाभावी और सहयोगी नहीं है,तो आपके अकेले के ऐसा होने से क्या परिणाम होगा?बस,आपकी दिक्कतों में बढ़ोतरी होगी। उपयोगिता, स्वार्थ और उन्मुक्त भोग के संसार में प्रेमपूर्ण, सहयोगी और करुणामय व्यक्ति का जीवन दुखों से भरना सुनिश्चित है। कोई ताकत इसे रोक नहीं सकती है।अब्राहमिक सभ्यता के प्रभाववश हमारे अधिकांश धर्मगुरु, योगी, संन्यासी, स्वामी, कथाकार, सुधारक, नेता,शिक्षक आदि पूरी तरह से स्वार्थ में डूबे हुये हैं।इसीलिये ये सभी सर्वप्रथम अपने पद, अपनी प्रतिष्ठा, अपने बैंक बैलेंस, अपनी अय्याशी, अपने भव्य आश्रम, महंगी गाड़ियों और अपनी सुख- समृद्धि को बढ़ाने में लगे हुये हैं। लेकिन ध्यान रहे जनमानस को भ्रमित करने के लिये इनके उपदेश सदैव सेवा,प्रेम, करुणा, भाईचारे और सौहार्द के होते हैं। इनके लिये इस प्रकार का दोगलापन कला है। विष्णुगुप्त चाणक्य का वचन याद करो, जिसमें वो संसारियों के बारे में कहते हैं कि नदी पार करके लोग नाव को छोड़ देते हैं। चिकित्सा होने पर बैद्य को छोड़ देते हैं।भोग करने के बाद विपरीतलिंगी एक दूसरे को छोड़ देते हैं। यानी काम पूरा होने के पश्चात् साधन से मोह मत रखें। अन्यथा परेशानी होगी। परस्पर एक दूसरे को साधन की तरह, वस्तुओं की तरह इस्तेमाल करो और आगे बढ़ जाओ। संसार का यही नियम है। हां, यदि आप सनातनी हो,तो बात अलग है। फिर आपको अपने जीवन को स्वार्थ से आगे बढ़कर निःस्वार्थता की तरफ ले जाना होगा।जिसकी शिक्षा वेद इस तरह से देता है –

सं गच्छध्वं सं वद्ध्वं सं वो मनांसि जानताम्।

देवा भागं यथापूर्वे संजानाना उपासते।।

अर्थात् सभी मिलकर एक साथ चलो। सभी एक मन वाले बनो।

3.) जहां तक भौतिक सुख सुविधाओं की बात है हमारा सिस्टम ऐसा बन चुका है कि भारत में अयोग्य व्यक्तियों को सब कुछ मिल जाता है लेकिन योग्य व्यक्ति खाली के खाली रह जाते हैं।जो जितना तिकड़मबाज और चापलूस है,वह उतना ही सफल कहलाता है। लेकिन जो व्यक्ति जितना योग्य,समर्थ और मेहनतकश है,वह उतना ही अधिक फिसड्डी सिद्ध होकर रह जाता है।

गधों को च्यवनप्राश,बादाम, चिलगोजे, काजू खाने को मिलते हैं लेकिन हंसों को कूड़ेदान में मुंह मारकर भूख मिटाने को विवश होना पड़ता है।या तो इस सिस्टम का हिस्सा बन जाओ या फिर सत्यनिष्ठ, समर्पित, मेहनतकश होकर भूखमरी, बदहाली और बेरोजगारी के लिये तैयार रहो। किसी को दोष देने की बजाय पहले खुद की जीवन-शैली को देखो। अपनी हालत के लिये आप खुद जिम्मेदार हो, कोई अन्य नहीं।

4.) धोखाधड़ी,भ्रष्टाचरण,छल,कपट और हिंसा के द्वारा अर्जित भौतिक सुख-सुविधाओं से क्षणिक सुख तो मिल ही जाता है। इससे कोई रोक नहीं सकता है। पूर्व और पश्चिम के अधिकांश जनमानस इसी को जीवन में सफलता पाना कहते हैं। लेकिन इसमें दिक्कत यह है कि हरेक भौतिक पदार्थ, वस्तु, धन -दौलत ,बैंक बैलेंस,आवास, गाड़ी, जमीन और भोग से प्राप्त सुख कुछ देर ही टिक पाता है। और इसके पश्चात् वह अपना प्रभाव खोकर और भी बड़े सुख को पाने के लिये प्रेरित कर देता है।और अधिक,और ज्यादा और भव्य को प्राप्त करने के चक्कर में वह व्यक्ति हर प्रकार की अनैतिकता,तिकड़मबाजी, धोखाधड़ी, चापलूसी,छल,कपट और हिंसा को करने के लिये लग जाता है। फिर तो वह पीछे मुड़कर देखता ही नहीं है। ऐसे ही एक दिन मौत आ जाती है। इनमें से कोई विरला ऐसा होता है कि जिसको अपनी मूढता का आभास हो जाता है। ऐसा व्यक्ति फिर अध्यात्म की ओर चल पड़ता है। यहां से उसकी असली सुख पाने की यात्रा शुरू होती है। यदि नकली गुरुओं, योगियों, संन्यासियों, तांत्रिकों,कथाकारों,महाम़डलेश्वरों और नामदानियों के चंगुल में न फंसे तो उसके जीवन में क्रांति होना निश्चित है।

5.) यदि पूर्व जन्मों का कोई पुण्य काम कर जाये या इसी जन्म की किसी तपस्या से अक्ल आ जाये तो इस जन्म में भी कोई व्यक्ति सांसारिक सुख – दुख के बीच में रहते हुये अध्यात्म की यात्रा पर निकल पड़ता है। भौतिक सफलता सबको दिखलाई पड़ जाती है लेकिन आध्यात्मिक सफलता किसी को दिखलाई नहीं पड़ती है। भौतिक सफलता प्राप्त व्यक्ति छाती को ताने हुये, महंगे भोजन खाते हुये, आलीशान भवनों में रहते हुये, महंगी विदेशी गाड़ियों में घूमते हुये, करोड़ों -अरबों का बैंक बैलेंस रखते हुये तथा उन्मुक्त भोग-विलास करते हुये जीवन जी सकता है।लेकिन ध्यान रहे कि ऐसे व्यक्ति को बाहरी क्षणिक सुख मिलता है,स्थायी सुख नहीं।सुख आया नहीं कि चले गया।

6.)’जाति’ के नाम पर होने वाले भेदभाव, छूआछूत और ज़ुल्म के विरोध में आंदोलन करने वाले युवा ही अपना जातिवादी परिचय देते मिलते हों तो जातिवाद कैसे समाप्त होगा? आरक्षण हो या कोक्रोच जनता पार्टी का आंदोलन हो या जातिवाद को समाप्त करने का मामला हो या जाति के नाम पर अतिरिक्त सुविधाएं लेने का विषय हो- यदि ये लोग वास्तव में ही जातिवाद को समाप्त करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम इनको खुद से पहल करनी होगी। सर्वप्रथम इनको खुद के नामों के साथ जाति, गोत्र या पहचान को समाप्त करना होगा। लेकिन ये ऐसा नहीं कर रहे हैं।इनको जातिवाद समाप्त भी करना है तथा ये अपनी जातीय पहचान को खोना भी नहीं चाहते हैं।इसका मतलब यह हुआ कि ये खुद ही नहीं चाहते कि जाति और जाति के नाम पर होने वाला भेदभाव, छुआछूत तथा ज़ुल्म समाप्त हो जायें। ये जाति की आड़ में सिर्फ राजनीति कर रहे हैं। किसी प्रकार के सुधार या समभाव या समानता या न्याय से इनको कोई लेना-देना नहीं है।कोक्रोच जनता पार्टी के सभी मुख्य युवा अपने नाम के साथ अपनी जातीय पहचान जीवित रखे हुये हैं। दहिया,रांका,दास आदि क्या हैं? और जितने भी युवा जंतर-मंतर गये हुये थे, उन्होंने अधिकांश रुप से अपनी जातीय और गोत्रीय पहचान बनाकर रखी हुई है।उनका परिचय लो,वो तुरंत दहिया, सांगवान,मलिक,जाट, रोड़,राजपूत,बाम्मण,खाती,धानक, वाल्मीकि, अंबेडकर आदि कहते हुये मिल जायेंगे। ऐसे दोगले लोग क्या ख़ाक क्रांति करेंगे? खुद में बदलाव की हिम्मत नहीं है, लेकिन पूरे समाज और राष्ट्र को बदलने के लिये चले हैं। विभिन्न नामों के अंत में लगे हुये सिंह,बोस,अंबेडकर,गांधी,राय, नेहरू, त्रिपाठी, द्विवेदी,नायकर,फूले आदि शब्दों का क्या अर्थ है? ये शब्द सेक्यूलर हैं या जातिवादी पहचान हैं या मजहबी पहचान हैं या क्षेत्रीय परिचय हैं? किसी के छायाचित्र की तख्तियां उठाकर जातिविहीन,पंथविहीन,मजहबविहीन समाज और राष्ट्र की स्थापना करने के आंदोलन चलाने वालों की मानसिकता का इससे पूरा परिचय मिल जाता है। वास्तव में इस प्रकार के सारे आंदोलन स्वयं में जातिवादी, मजहबी,क्षेत्रीयता को बढ़ावा देने वाले राजनीतिक होते हैं। इनमें आमूल बदलाव का कोई जज्बा नहीं होता है।इसीलिये इस प्रकार के सभी आंदोलन कुछ समय पश्चात् ही जनता जनार्दन के शोषण का कारण बनने लगते हैं। लोहिया और जयप्रकाश का समाजवादी आंदोलन तथा अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन इसका जीता-जागता प्रमाण हैं।

7.)जाति, मजहब,पंथ और क्षेत्र का विरोध करने वाले लोगों को इनके नाम पर सरकार से अतिरिक्त सुविधाएं भी चाहियें तथा ये इनको समाप्त भी करना चाहते हैं। दोनों काम एक साथ कैसे हो सकते हैं?जाति, मजहब,पंथ और क्षेत्र के जहरीले सांप (इनके खुद के अनुसार) को इन्होंने अपने गले में भी डाला हुआ है तथा इनको इससे छूटकारा भी चाहिये। यदि छूटकारा चाहिये तो गले से इस सांप को निकालकर फेंक दो। इसके पश्चात् इनके विरोध में आंदोलन करने की सोचना। हकीकत यह है कि ये लोग वास्तव में चाहते ही नहीं कि भारत से जातिवाद,पंथवाद,मजहबवाद और क्षेत्रवाद समाप्त हों। निठल्ले बैठकर जब सभी सुविधाएं मिल रही हों तो कुछ भी अनैतिक, अमानवीय और संवेदनहीन किया जा सकता है। भारत में आजादी के पश्चात् के अधिकांश आंदोलन इसी तरह से चले हैं।इसीलिये कोई बदलाव कहीं पर दिख नहीं रहा है।

8.)रिश्वत देकर सुविधाएं प्राप्त करना भारत में मौजूद सिस्टम की सबसे बड़ी विशेषता बन गई है। मकान, दुकान, प्लाट, रजिस्ट्री,परीक्षा,एडमिशन, पुलिस, नौकरी, स्थानांतरण, न्यायालय आदि आदि कहां पर रिश्वत देकर काम नहीं करवाये जा रहें हैं? भारत में मौजूद सिस्टम में भ्रष्टाचार सर्व- स्वीकृत हो गया है। इससे अब किसी को कोई दिक्कत नहीं होती है। भ्रष्टाचार में जब किसी को रुपये मिलते हैं तो कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन जब रिश्वत देना होता है तो कुछ लोगों को दिक्कत होती है। जिनको दिक्कत होती है, उनकी संख्या बहुत कम है। भारत में किसान आंदोलन, महिला पहलवान आंदोलन,शिक्षक आंदोलन, पटवारी आंदोलन, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आंदोलन, पुलिस भर्ती में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन, सैनिकों का आंदोलन आदि कितने आंदोलन हुये हैं? लेकिन अधिकांश पढ़ें -लिखे वर्ग ने उपरोक्त आंदोलनकारियों को पाकिस्तानी,खालिस्तानी,देशद्रोही और विदेशी एजेंट तक कहने में गुरेज नहीं किया।सब आंदोलनकारी अलग-अलग पिट रहे हैं। इनके एक साथ आंदोलन करने से सिस्टम को दिक्कत हो सकती है, इसलिये सिस्टम इन्हें एक नहीं होने दे रहा है। किसी न किसी बहाने से इनमें एकता होने से रोका जाता है। भ्रष्ट सिस्टम आज तक अपने इस प्रयास में सफल रहा है। काक्रोच जनता पार्टी जैसा आंदोलन अपरिपक्व,सतही,उथला अधकचरा और निष्क्रिय आंदोलन है। इसमें कोई गंभीरता नहीं दिखाई दे रही है।इसीलिये जिन करोड़ों लोगों ने सोशल मीडिया पर इसको फालो किया था, जंतर-मंतर पर उनमें से केवल दो चार हजार युवा ही पहुंचे। बिना किसी तैयारी के यह तो होना ही था।

9.)विफल राजा अपनी विफलताओं को छिपाने के लिये सदैव तानाशाही का सहारा लेता है।भारत में भी वही गलती दोहराई जा रही है।देश के विरोध में बोलने वाले लोग जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर सकते हैं लेकिन अन्नदाता किसान, युवाशक्ति भारत, पहलवान खिलाड़ियों को ऐसा करने की आज्ञा नहीं है। हमारे लोकतंत्र की नींव खोखली, भुरभुरी और दलदली हो चुकी है। वैसे यह लगता है कि भारत के युवाओं का ग़ुस्सा एक बार फिर से काक्रोच जनता पार्टी के माध्यम से गलत जगह पर इस्तेमाल होने वाला है। शायद यह सारा तामझाम सत्ता के लोगों द्वारा ही आयोजित किया गया हो। इंडिया स्पीक्स डेली के राष्ट्रवादी पत्रकारिता करने वाले संदीप देव ने भी ऐसी संभावना व्यक्त की है। उन्नीसवीं सदी में भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति की आग को ठंडा करने के लिये जिस तरह से एओ ह्यूम को को लाया गया था, इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में कांग्रेस के विरोध में युवाओं के जोश को यूज करने के लिये जिस तरह से अन्ना हजारे को आगे लाया गया था, ठीक उसी तरह से कहीं सनातन धर्म और संस्कृति विरोधी विचारकों द्वारा काक्रोच जनता पार्टी को आगे तो नहीं लाया जा रहा है ? काक्रोच जनता पार्टी के जो तीन -चार युवा अब तक सामने आये हैं,उनकी विचारधारा अतीत में सनातन धर्म, जीवनमूल्यों, साहित्य, दर्शनशास्त्र और संस्कृति विरोधी रही है।जो हाल ए ओ ह्यूम के द्वारा भारत का हुआ,जो हाल अन्ना के द्वारा भारत का हुआ , कहीं वही कहानी फिर से तो नहीं दोहराई जा रही है?बेशक बड़े आंदोलन स्वत:स्फूर्त होते हैं लेकिन फिर उनके लिये तैयारी करना आवश्यक होता है। जनमानस से मिलना-जुलना होता है। सहमति बनानी होती है। सभी वर्गों को साथ लाना होता है।उसकी पूरी रुपरेखा बनाना होता है। अगुआई करने के लिये प्रबुद्ध और ओजस्वी लोगों की जिम्मेदारी निश्चित करना होता है। नियमावली और अनुशासन संहिता बनाना होता है। भ्रष्ट सिस्टम के पास पहले ही सारी गुप्त सूचनाएं होती हैं। यदि काक्रोच जनता पार्टी का आयोजन विस्तृत होने वाला होता तो पुलिस खुद हवाई अड्डे पर जाकर उसकी अनुमति नहीं देती। बिना तैयारी और भ्रष्ट सिस्टम की सांठगांठ के कारण भीड़ जंतर मंतर पर नहीं जुट पाई। भ्रष्ट सिस्टम ने बड़ी चालाकी से बड़ा आंदोलन होने से रोक दिया। युवा -वर्ग का ग़ुस्सा गायब हो गया है। फिर से युवा -वर्ग पिटने, लुटने, प्रताड़ित होने और भ्रष्ट सिस्टम की दरिया बिछाने, नारेबाजी करने और नकली राष्ट्रवाद की स्थापना करने में जुट जायेगा।

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डॉ. शीलक राम आचार्य

दर्शनशास्त्र- विभाग

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय

कुरुक्षेत्र136119

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