साहित्य

कालचक्र विधा -दोहा 

डॉ गीता पांडेय

कालचक्र में सब बंँधे, कर्मों के अनुरूप।

राजा होता रंक है, रंक बने है भूप।।

 

कालचक्र के साथ में,चलता जो इंसान।

बनी जगत में है सदा, उसकी शुभ पहचान।।

 

कालचक्र नित घूमता, चलता है अविराम।

लेखा जोखा संग रख, देता है परिणाम।।

 

श्रेष्ठ कर्म जिसके रहे, उसका ही यश गान।

कालचक्र से तो कभी,बचे नहीं भगवान।।

 

जन्म-मृत्यु आधार है, रहता सबके पास।

कालचक्र देता बदल,मानव का इतिहास।

 

सारे तीरथ धाम से,बढ़कर होता दान।

कालचक्र है देखता,डिगेँ नहीं ईमान।।

 

कालचक्र में जीव के, रहें समाहित कर्म।

कभी ज्ञान विज्ञान भी, समझ न पाया मर्म।।

 

कालचक्र अनुकूल यदि, देता खुशी हजार।

होता है विपरीत जब, मिलता कष्ट अपार।।

 

कालचक्र के मर्म को,समझ सका है कौन।

शब्द कभी करता नहीं, रहता है यह मौन।।

 

कालचक्र के सामने,चलता कब है जोर।

किस्मत किसकी दे पलट, बिना किए यह शोर।।

 

कालचक्र के सामने, सब होते लाचार।

बना विधाता लेख यह, जन्म मृत्यु स्वीकार।।

 

कालचक्र को ध्यान रख,करे कर्म अभिराम।

उसका ही चिरकाल तक, रहता जग में नाम।।

 

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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