
ज़ारों दोस्त मोबाइल में, फिर भी तन्हा शाम है,
हर तरफ रौशनी है, फिर भी दिल में गुमनाम है,
उंगलियाँ चलती रहतीं स्क्रीन पर दिन-रात,
पर आँखें तरसतीं हैं दो पल की बात।
स्टेटस पर हँसी है, डीपी पर मुस्कान,
पर भीतर के कमरे में सन्नाटा सुनसान,
लाइक्स की भीड़ में खो गया अपनापन,
कमेंट्स के शोर में दब गया मन का दर्पण।
साथ बैठकर भी सब अपने फोन में खोए हैं,
रिश्ते ऑनलाइन हैं, पर जज़्बात सोए हैं
वीडियो कॉल पर मिलते हैं, छू नहीं पाते,
इमोजी भेजते हैं, गले नहीं लग पाते।
घर में चार लोग हैं,पर बात नहीं होती,
दिल की दीवारें ऊँची,मुलाकात नहीं होती,
डिजिटल इस दुनिया ने पास लाकर दूर किया,
इंसान को इंसान से ही मजबूर किया।
मौलिक,स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन




