साहित्य

सीबीएसई का मूल्यांकन घोटाला और नकारे प्रधान

भारत की शिक्षा व्यवस्था में सीबीएसई को सबसे प्रतिष्ठित बोर्डों में एक गिना जाता है। हर वर्ष लाखों विद्यार्थी इसकी परीक्षाओं में सम्मिलित होते हैं और उनके भविष्य का बड़ा हिस्सा बोर्ड परीक्षा के अंकों पर निर्भर करता है। लेकिन हाल के वर्षों में, विशेषकर 2024 और 2026 में, सीबीएसई की मूल्यांकन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों ने मूल्यांकन प्रक्रिया में भारी गड़बड़ियों, तकनीकी विफलताओं और प्रशासनिक लापरवाही के आरोप लगाए।किंतु सभी के आरोपों पर बिना कोई विचार किए केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में ऑन स्क्रीन मार्किंग जैसे नवाचार ने जहाँ लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से न केवल खिलवाड़ करने का अपराध किया है अपितु उन्हें मानसिक अवसाद में भी पहुँचा दिया है।जिससे प्रधान के नक्कारेपन ने इस पूरे विवाद में“सीबीएसई मूल्यांकन घोटाला” जैसी बहस को जन्म दिया है।

ध्यातव्य है कि केंद्रीय शिक्षामंत्री प्रधान का कार्यकाल ऐसा नहीं है कि केवल विद्यार्थियों के लिए दुखदाई रहा है अपितु टेट परीक्षा को लेकर शिक्षकों के लिए भी जीने मरने का प्रश्न बन गया है।सबसे गौरतलब बात तो यह है कि विद्यार्थियों ने आरोप लगाया है कि मंत्रालय ने समय रहते समस्याओं को स्वीकार नहीं किया और छात्रों की चिंताओं को गंभीरता से लेने में विफल रहा।इतना ही नहीं सीबीएसई ने उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को डिजिटल बनाने के लिए “ऑन-स्क्रीन मार्किंग” प्रणाली लागू बिना मूल्यांकन और मापन के विशेषज्ञों के परीक्षण और मंत्रणा के ही लागू की। यद्यपि इसका उद्देश्य पारदर्शिता और गति बढ़ाना बताया गया था परंतु जल्दीबाजी में बिना विमर्श और मंथन के यह प्रयोग अनेक समस्याओं के कारण विवादों में घिर गया।रिपोर्टों के अनुसार, कई विद्यार्थियों ने आरोप लगाया कि उन्हें अपेक्षा से बहुत कम अंक मिले। कुछ छात्रों ने दावा किया कि उनके प्री-बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रदर्शन की तुलना में बोर्ड परिणाम अत्यंत असामान्य थे।

विचारणीय प्रश्न तो यह हैं कि कई शिक्षकों और छात्रों ने यह भी कहा कि स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाएँ धुंधली थीं, अतिरिक्त पृष्ठ दिखाई नहीं दे रहे थे तथा सॉफ्टवेयर में तकनीकी त्रुटियाँ थीं।इसके अलावा सोशल मीडिया और छात्र मंचों पर यह आरोप व्यापक रूप से सामने आया कि परीक्षकों को अत्यधिक दबाव में कम समय में कॉपियाँ जाँचने को कहा गया। कुछ पोस्टों में यह दावा किया गया कि सॉफ्टवेयर समय सीमा पूरी होते ही कॉपी स्वतः जमा कर देता था।

जिससे तकनीकी खामियाँ और सुरक्षा पर प्रश्न खड़ा होना लाजिमी है।वर्ष 2026 में स्थिति और गंभीर तब हुई जब कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि ऑन स्क्रीनमार्किंग पोर्टल में सुरक्षा संबंधी कमजोरियाँ मौजूद थीं, जिनसे अंकों में बदलाव संभव हो सकता था।हालाँकि सीबीएसई ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि वास्तविक मूल्यांकन पोर्टल सुरक्षित है और कथित हैकिंग केवल एक परीक्षण वेबसाइट से संबंधित थी।फिर भी छात्रों और अभिभावकों के बीच अविश्वास बढ़ता गया। पुनर्मूल्यांकन पोर्टल में भुगतान कटने, उत्तर पुस्तिका डाउनलोड न होने और वेबसाइट क्रैश जैसी समस्याएँ भी सामने आईं।

इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि यदि देश का सबसे बड़ा शिक्षा बोर्ड अपनी डिजिटल प्रणाली को सुरक्षित और स्थिर नहीं रख पा रहा, तो छात्रों के भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा?आंतरिक मूल्यांकन में अनियमितताएँ कौन दूर करेगा?ध्यातव्य है कि सीबीएसई ने स्वयं स्वीकार किया कि लगभग 500 संबद्ध विद्यालयों में थ्योरी और प्रैक्टिकल अंकों के बीच असामान्य अंतर पाया गया। बोर्ड ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विश्लेषण के बाद स्कूलों को चेतावनी जारी की और आंतरिक मूल्यांकन प्रक्रिया की समीक्षा करने को कहा।

जिससे यह तथ्य दर्शाता है कि समस्या केवल डिजिटल मूल्यांकन तक सीमित नहीं थी, बल्कि स्कूल स्तर पर भी अंक देने की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएँ थीं।डमी स्कूल और प्रशासनिक विफलता भी विद्यार्थियों पर भरी पड़ी।सीबीएसई द्वारा कई “डमी स्कूलों” के खिलाफ कार्रवाई भी की गई, जहाँ नियमों का उल्लंघन, फर्जी प्रवेश और रिकॉर्ड में गड़बड़ियाँ पाई गईं।यह स्थिति शिक्षा तंत्र की गहरी बीमारी को उजागर करती है। यदि बोर्ड से संबद्ध विद्यालय ही नियमों का पालन नहीं कर रहे, तो यह केवल विद्यालयों की विफलता नहीं बल्कि निगरानी तंत्र की भी असफलता है।

“नकारे प्रधान” की आलोचना क्यों?वर्तमान में यह देश का सबसे बड़ा विमर्श का विषय है।इस पूरे विवाद के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री विपक्ष और छात्रों के निशाने पर रहे। आलोचकों का आरोप था कि मंत्रालय ने पहले समस्याओं को “अफवाह” कहकर खारिज किया और बाद में दबाव बढ़ने पर सफाई दी।बाद में शिक्षा मंत्री ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि ऑन स्क्रीन मार्किंग प्रणाली में समस्याएँ आईं और सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं।लेकिन तब तक छात्रों का भरोसा काफी हद तक टूट चुका था। सोशल मीडिया पर “नकारे प्रधान” जैसे शब्दों का प्रयोग इसी नाराजगी और प्रशासनिक असंतोष का प्रतीक बन गया। आलोचकों का कहना है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तकनीकी प्रयोग बिना पर्याप्त तैयारी के लागू करना गंभीर लापरवाही है।

मालूम हो कि बोर्ड परीक्षा केवल अंक नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य, आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी होती है। कई छात्रों ने सोशल मीडिया पर तनाव, अवसाद और भविष्य को लेकर भय व्यक्त किया।यदि मूल्यांकन प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए, तो मेहनती विद्यार्थियों का मनोबल टूटना स्वाभाविक है। शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य प्रतिभा को प्रोत्साहित करना होना चाहिए, न कि तकनीकी अव्यवस्था के कारण छात्रों को हतोत्साहित करना।

इस पूरे विवाद ने कुछ महत्वपूर्ण सुधारों की आवश्यकता को सामने रखा हैजैसे मूल्यांकन प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता और छात्रों को उनकी जाँची हुई उत्तर पुस्तिकाएँ आसानी से उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

तकनीकी प्रणाली का स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए तथा ऑन स्क्रीन मार्किंग जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का साइबर सुरक्षा और कार्यक्षमता के आधार पर स्वतंत्र परीक्षण होना चाहिए।नई तकनीक लागू करने से पहले शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण और समय दिया जाना चाहिए।परिणामों से प्रभावित छात्रों के लिए परामर्श सेवाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।यदि किसी स्तर पर लापरवाही सिद्ध होती है, तो संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई आवश्यक है।

सार संक्षेप में कहना उचित होगा कि सीबीएसई मूल्यांकन विवाद केवल तकनीकी गड़बड़ी का मामला नहीं, बल्कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही, पारदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता पर गंभीर प्रश्न है। लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी परीक्षा प्रणाली में किसी भी प्रकार की लापरवाही अस्वीकार्य है।

व्यावहारिक और तकनीकी दोनों ही दृष्टि से यदि देखा जाए तो शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान दुर्दशा का एक कारण अंधाधुंध तकनीकी नवाचार और प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर मूल्यांकन तक सारे दायित्वों के लिए प्राइवेट कंपनियों पर निर्भरता है।नवाचार किया जाना अवश्य आवश्यक आवश्यकता है किंतु इसकी आड़ में अन्य प्रविधियों की इतिश्री करना दुखदायी है।जिसके लिए प्रधान कत्तई माफी के पात्र नहीं हैं।ऐसा लगता है कि भारत के विभिन्न विश्विद्यालयों में कार्यरत मापन और मूल्यांकन प्रविधियों के शिक्षाशास्त्रियों को नजरंदाज करके अपनी मनमानी करना ही आज केंद्रीय शिक्षामंत्री की प्रवृत्ति बनता जा रहा है अन्यथा ऐसा हो ही नहीं सकता था डिजिटल तकनीक शिक्षा को बेहतर बना सकती है, लेकिन बिना तैयारी और निगरानी के वही तकनीक अविश्वास और अराजकता का कारण बन जाती है। इस पूरे प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि ईमानदार प्रशासन, तकनीकी दक्षता और छात्रों के प्रति संवेदनशीलता से संभव है।

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