
क एक जलाए रखना,
तुम अंधियारी राहों में।
फैलेगा उजियारा ऐसा,
आस जगेगी चाहों में।
यहाँ अकेला नहीं है तू,
साथ तेरे विश्वास है।
मंज़िल भी अब दूर नहीं, बिल्कुल तेरे पास है।
ईश भी देगा साथ तेरा,
असर है तेरी आहों में ।।
दीपक एक जलाए रखना
तुम अंधियारी राहों में।।
जूझे नन्हा दीप अकेला,
आंँधी और तूफ़ानों से।
हँसती हुई सुबह आती नित ,
भीत नहीं अवसानों से।।
खोया है तो पा भी लेंगे,
सीखेंगे प्रतिघातों से।।
रुके कभी न जीवन नैया ,
प्रबल झंझावातों से।।
लिख अब विजय-गाथ अपनी,
शौर्य भरा तव बाँहों में ।
दीपक एक जलाए रखना,
तुम अंधियारी राहों में।।
प्रलय के बाद सृजन होगा,
अटल यही नियम है।
हर ज्वार भाटे में बदले,
यहीं उत्थान-पतन है।
धूप-छाँह और सुख-दुःख का
होता सदा मिलन है ।
घन-किरनों की लुका-छिपी,
प्रकृति का नर्तन है।
कंचन कुंदन बनकर निखरे,
दारुण दुख के दाहों में।
दीपक एक जलाए रखना,
तुम अंधियारी राहों में।
बता कौन है यहाँ न झेला,
जिसने नियति के वारों को?
किसके अरमां गए नहीं कुचले,
रोया न जो अश्रुधारों से ?
हर पतझर के बाद जो आतीं,
भेंट ले उन्हीं बहारों से।
बदल लिपि ललाट की अब,
गुंजा गीत अंगारों के।
हर जड़ता का तर्पण कर ले,
तरंगित जीवन-प्रवाहों में ।।
दीपक एक जलाए रखना,
तुम अंधियारी राहों में।।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




