
के पर्वत केवल उत्तराखंड के नहीं हैं, वे पूरे भारत की अमूल्य धरोहर हैं। हिमालय भारत की जीवनरेखा है। इसकी गोद से निकलने वाली नदियाँ करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती हैं और खेतों को जीवन देती हैं। इसलिए पर्वतों और वनों की रक्षा करना केवल एक राज्य का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का दायित्व है। यही सच्ची राष्ट्रसेवा और राष्ट्रपूजा है।
आज देश के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में प्रकृति पर बढ़ता दबाव चिंता का विषय है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अनियंत्रित कटान, अव्यवस्थित निर्माण और भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और मेघालय के जंगल भी मानवीय गतिविधियों और वन क्षरण की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा के विशाल वन क्षेत्रों में खनन और अंधाधुंध संसाधन दोहन से प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो रहा है। पश्चिमी घाट के कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के वन, जो विश्व की महत्वपूर्ण जैव-विविधता का केंद्र हैं, वे भी लगातार दबाव झेल रहे हैं।
प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है। कहीं भूस्खलन हो रहा है, कहीं बादल फट रहे हैं, कहीं नदियाँ सूख रही हैं, तो कहीं भीषण गर्मी और जल संकट बढ़ रहा है। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का संकट है।
यदि पर्वत नहीं बचेंगे तो नदियाँ नहीं बचेंगी। यदि जंगल नहीं बचेंगे तो वर्षा का संतुलन बिगड़ जाएगा। यदि जल नहीं बचेगा तो खेती नहीं बचेगी, और यदि खेती नहीं बचेगी तो मानव जीवन भी संकट में पड़ जाएगा।
अपने आप को इस विनाश से बचाइए। आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रखिए। विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले, न कि उसे नष्ट करके।
याद रखिए –
पर्वत बचेंगे तो जल बचेगा,
जल बचेगा तो अन्न बचेगा।
जंगल बचेंगे तो वर्षा बचेगी,
वर्षा बचेगी तो जीवन बचेगा।
और जब प्रकृति बचेगी, तभी मानव और राष्ट्र बचेगा।
पहाड़ों का विनाश, अपना विनाश है।
प्रकृति की रक्षा ही मानवता की रक्षा है।
प्रकृति की सेवा ही सच्ची राष्ट्र सेवा है।
सीता सर्वेश त्रिवेदी शाहजहांपुर




