
संताप वसुंधरा का,
कैसे धरा रो रही है आज?
दुखी है वन सूखी नदियां,
गिर पड़ी है इन पर गाज।
कोई धरा की जाने ना पीर,
हर आंख से बहता है नीर।
वृक्ष काटकर सूने किए गांव,
किसी को मिलती नहीं छांव।
धुएं से सारा आसमान भर गया,
धरा की दशा देख मन डर गया।
मैली हो गई है अब सारी हवाएं,
अब कैसे हम प्रकृति को बचाएं?
गर्मी दिनों दिन बढ़ती जा रही है,
हरी भरी भूमि बंजर हुई जा रही है।
पर्वत मायूस नदियां हुई लाचार,
विकास ने भुलाया प्रकृति का प्यार।
आओ हम सब मिलकर वृक्ष लगाएं,
जल जंगल और अपनी भूमि बचाएं।
बदल दे हम अपनी धरा की तकदीर,
बनाए सुंदर अपने भविष्य की तस्वीर।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




