
भोले की राह चला करता,
भोले की राह बुहारूं मैं,
आए थे ….आए थे …
रात वो सपने में,
मैं दर्शन का अभिलाषी था।
भोले की …भोले की राह …
तुम लूट सको तो लूट भी लो,
भक्ति का भरा भंडार यहां,
भोले तो..भोले तो इतने भोले हैं,
बस प्रेम सुधा भर कर पीलो।
भोले की …भोले की राह..
भोले के संग जो चलता है,
वो जीवन सफल बनाता है,
भोले की ..भोले की नैया पार लगी,
खुद भवसागर तर जाता है।
भोले की ..भोले की राह …
मन की इच्छाओं का सागर,
भोले के संग…भोले के संग इठलाता है,
जीवन का राग सुनाता है।
भोले की राह चला करता..।
(269/327 वां मनका)
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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर इन्दौर (म.प्र.)




