
परहित कर्म करे जो इंसा
वह इंसा कहलाता है
मर के भी वह अमर है रहता
ध्रुव तारा बन जाता है।
नश्वर जग में शाश्वत है ये
परहित धर्म न दूजा कोई
जिसने इसकी राह है पकड़ी
वह ईश्वर कहलाता है।
अपने में यह शक्ति बड़ी है
पर कांटों से राह भरी है
इस पर जिसने कदम बढ़ाया
वह फूलों सा मुस्काता है।
डॉ.उमा रानी दुबे
जयपुर, राजस्थान




