
कभी-कभी सोचती हूं मैं स्क्रीन के उस पार की दुनिया कैसी होगी?
क्या वहां भी मेरे जैसे ही निराशाओं में बंधी जिंदगी होगी?
क्या मेरे जैसा ही धड़कता दिल और आंखों में उम्मीदें होगी?
आखिर स्क्रीन के उस पार की दुनिया कैसी होती होगी?
कभी-कभी हम अपनी सारी दिल की बातें स्क्रीन पर कह देते हैं,
मन हल्का हो जाता है और कुछ देर के लिए गम भुला देते हैं।
पर कौन है उस स्क्रीन के पीछे जो हमारी बातें सुन लेता है,
पास न होकर भी जीवन में खुशियों के रंग भर देता है।
कभी हंसी कभी दर्द सब कुछ हम स्क्रीन पर बस कह देते हैं,
एक क्लिक से इस पार से उस पार की दूरी मिटा देते हैं।
माना की स्क्रीन भ्रम की दुनिया है पर फिर भी अच्छी लगती है,
वास्तविकता नहीं है फिर भी स्क्रीन की दुनिया सच्ची लगती है।
स्क्रीन के उस पार भी शायद कोई हमारे जैसा ही इंसान हो,
थोड़ा अच्छा और थोड़ा बुरा शायद उसका भी ईमान हो।
इसलिए शब्दों में थोड़ी संवेदना और सम्मान बनाए रखना,
लोग कभी हमको भूल न पाए इतनी सी पहचान रखना।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




