साहित्य

कुंडलियाँ छंद : प्रभु से प्रेम

सुशीला फरमानिया 'दीप्त'

अर्पण ईश्वर निज करो, चरण कमल धर ध्यान ।
प्रेम नित्य इनसे करो, पूर्ण होते काम ।।
पूर्ण होते काम, सत्य पथ तुम्हें दिखाते ।
अभिभावक बन ज्ञान, बोध वह खूब सिखाते ।।
कहे सुशीला भाव, भटक मत जग आकर्षण ।
धर्म-कर्म रख नेह, देव कर सब कुछ अर्पण ।।

अर्पण तन-मन कर रही, प्रियतम है चितचोर ।
दृग विह्वल जब प्रेम में, मैं तो भाव विभोर ।।
मैं तो भाव विभोर, सखी सुध भूली सारी ।
श्याम मिलन की चाह, सोचती आये बारी ।।
कहे ‘दीप्त’ यह बात, जगत है मिथ्या हर क्षण ।
गर नारायण चाह, प्राण कर प्रभु को अर्पण ।।

अर्पण जीवन ईश कर, हृदय प्रेम हो चाह ।
चल वृंदावन जीव अब, लगे मधुर बृज राह ।।
लगे मधुर बृज राह, धाम यह रास बिहारी ।
दर्श देव गंधर्व, संग में राधा प्यारी ।।
विनय सुशीला आज, कृष्ण हों सबके कण-कण ।
तज दो सकल प्रमाद, करो सब माधव अर्पण ।।

सुशीला फरमानिया ‘दीप्त’

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