
क्या आपने कभी जानने की कोशिश की है कि तेज़ करारी धूप हो या बारिश की तेज़ बौछारें पड़ रही हों, फिर भी भक्तजन नंगे पाँव, कंधे पर काँवड़ लिए, चाहे पैरों में छाले हों और पीठ पर झोले, तब भी चेहरे पर मुस्कान लिए “बोल बम, बोल बम” का जयघोष करते चलते रहते हैं?
न हमारी कोई मजबूरी थी, न कोई गिला-शिकवा। बस एक जोश था, जो सावन का महीना आते ही मन में स्वयं ही उल्लास और इच्छा के रूप में पनप उठता था। जब मैं देखती कि लोग गेरुआ वस्त्र पहनकर काँवड़ लेकर जाते हैं, तो मेरे मन में भी विचार आता था—क्या मैं कभी जा पाऊँगी?
मैंने अपनी यह इच्छा बेहिचक अपनी मम्मी से कह डाली। उस समय मैं बी.ए. पार्ट-2 में पढ़ती थी। मन में कहीं-न-कहीं डर भी था कि लाखों लोगों की भीड़ में माँ मुझे जाने देंगी या नहीं।
उस समय न मैं “बोल बम” की पौराणिक कथा से परिचित थी और न ही शिव की परीक्षा से। मैं देवघर की निवासी हूँ। बचपन से ही सावन मास में घर के सामने से गुजरते काँवड़ियों की “बोल बम” की आवाज़ मेरे कानों में गूँजती रहती थी।
जब मैंने स्वयं काँवड़ यात्रा की, तब पता चला कि कितने श्रद्धालु बिना किसी भेदभाव के, एक ही रंग में रंगे, भूख-प्यास की परवाह किए बिना चलते रहते हैं। न समय की कोई पाबंदी होती है और न ही उस समय फेसबुक-इंस्टाग्राम का कोई क्रेज था। बस शिव की भक्ति में चलते जाना और शिव का नाम लेते जाना ही जीवन का उद्देश्य बन जाता था।
सुल्तानगंज से जल भरकर, शुद्ध तन-मन से काँवड़ को ऐसे सजाते थे मानो अपनी ही बारात की गाड़ी सजा रहे हों। रंग-बिरंगी लाइटों और चमकते बंदनवारों से उसे इस तरह सजाया जाता कि हर किसी को अपनी काँवड़ सबसे सुंदर लगे।
काँवड़ केवल बाँस की एक रचना नहीं है, बल्कि यह जीवन और मृत्यु का प्रतीक भी है। इसके दोनों सिरों को जोड़ने वाली रस्सियाँ जीवन के कर्मों की डोर का प्रतीक हैं और उनमें लटकते कलश हमारी आस्था तथा कठिन तपस्या का प्रतीक हैं।
काँवड़ यात्रा में मैंने जाना कि काँवड़िये कई प्रकार के होते हैं। उनमें से एक होते हैं डाक बम, जो बिना रुके सुल्तानगंज से जल लेकर देवघर पहुँचते हैं और भोले बाबा पर जल अर्पित करते हैं। डाक बमों की कठिन तपस्या वास्तव में अद्भुत होती है।
इस यात्रा ने मुझे हर परिस्थिति में रहना सिखाया। नींद के लिए न बिस्तर की आवश्यकता पड़ती थी और न किसी विशेष सुविधा की। जहाँ थोड़ी-सी जगह मिल जाती, वहाँ एक प्लास्टिक बिछाकर अन्य काँवड़ियों के साथ आराम कर लेती थी। पूरे दिन चलने से जो थकावट होती, वह कुछ समय के विश्राम के बाद न जाने कहाँ गायब हो जाती। फिर सुबह तीन-चार बजे स्नान करके इतनी ऊर्जा के साथ चल पड़ते, मानो आज ही यात्रा शुरू की हो।
मेरी मम्मी तेज़ धूप के कारण बीच-बीच में रुक-रुक कर चलती थीं। जब वे पूरी तरह थक जातीं, तब ऐसा लगता मानो महादेव स्वयं किसी को सारथी बनाकर भेज देते हों। कोई अनजान काँवड़िया उनका हाथ थामकर कहता, “बहना बम, चलते चलो।”
उस काँवड़िये की बात सुनकर ऐसा महसूस होता था, मानो स्वयं भोले बाबा आकर हमें साहस दे रहे हों। यह सचमुच किसी चमत्कार से कम नहीं था, क्योंकि पूरी यात्रा के दौरान फिर वह काँवड़िया कभी दिखाई नहीं दिया। शायद वह भोले बाबा ही थे, जिन्होंने किसी रूप में आकर हमें हिम्मत दी।
उसी हिम्मत और आशीर्वाद के बल पर हमने अपनी काँवड़ यात्रा पूरे मन और श्रद्धा के साथ पूर्ण की। भोले बाबा अपने भक्तों पर किसी-न-किसी रूप में कृपा अवश्य करते हैं।
मैं अपनी काँवड़ यात्रा के इस अनुभव को यहीं विराम देती हूँ।
जय शिव शंकर! जय बाबा बैद्यनाथ!
— प्रिया चक्रवर्ती
(कलकत्ता)




