साहित्य

अंतर्राष्ट्रीय नशा मुक्ति दिवस

डॉ संजीदा

26 जून सिर्फ़ तारीख़ नहीं, एक अलार्म है,

जो कहता है – उठो, नशा मौत का पैग़ाम है,

सिगरेट का धुआँ पहले मज़ा, फिर दमा देता है,

शराब का जाम पहले नशा, फिर मातम देता है।

 

सुई की नोक पर ज़िंदगी यूँ ही बिकी जाती है,

माँ की कोख से आई जवानी यूँ ही मिटी जाती है,

नशा घर नहीं जलाता, पूरे ख़ानदान जला देता है,

बेटे की लाश पर बाप को कफ़न सिला देता है।

 

कहने को दोस्ती में मिला था पहला कश ,

आज उसी कश ने छीन लिया रब का

दरस

अस्पताल के बेड पर जब साँस उखड़ती है,

तब आँखों के आगे सारी हसरतें तड़पती हैं।

 

आओ आज कसम खाएँ, इस दलदल से लड़ेंगे,

नशे के सौदागरों को अब घर-घर से पकड़ेंगे,

युवाओं को खेल, किताब, हुनर से जोड़ेंगे,

ज़िंदगी का जश्न मनाएँ, मौत को नहीं मोड़ेंगे।

 

नशा मुक्त हो परिवार, तभी देश बनेगा महान,

वरना खोखले जिस्मों से कैसे होगा उत्थान,

26 जून को बस रैली नहीं, इरादा चाहिए,

हर साँस को नशे से आज़ादी का वादा चाहिए।

 

मौलिक, स्वरचित

डॉ संजीदा खानम शाहीन

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